Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.23
मूल श्लोक :
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है जो मुक्त हो गया है जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस श्लोक में ज्ञानी पुरुष के लक्षणों का वर्णन करके जिस क्रम में उसके गुणों को बताया गया है वह स्वयं साधना मार्ग की ओर संकेत करता है। उपदेश को सूत्ररूप में वर्णन करने की सभी शास्त्रीय ग्रन्थों की एक विशेष शैली होती है। उसमें भी प्रतीक शब्दों के चयन के प्रति शास्त्रज्ञ अधिक सजग रहते हैं और उन शब्दों को एक विशेष क्रम देने में भी उन्हें आनन्द का अनुभव होता है। विचाराधीन श्लोक इसका एक उदाहरण है।गतसंगस्य जिस दैवी स्वरूप को ऋषियों ने प्राप्त किया वह कोई अज्ञात स्थल से प्राप्त की हुई नवीन उपलब्धि नहीं थी। यह पूर्णत्व तो सबका स्वयं सिद्ध स्वरूप ही है जिसे उन्होंने केवल पहचाना। बाह्य विषयों के साथ आसक्ति के कारण हमने अपने आपको स्वस्वरूप के राज्य के बाहर निष्कासित कर लिया है। ज्ञानी पुरुष वह है जो परिच्छिन्न जगत् की आसक्ति से पूर्णतया मुक्त है।मुक्तस्य अधिकांश साधकों को मुक्ति के संबंध में स्पष्ट ज्ञान नहीं होता। हम अपने आप ही अपने लिये बंधन उत्पन्न कर लेते हैं। अनेक प्रकार के बन्धनों का कारण है विषयों के साथ हमारी आसक्ति। विषयोपभोग में ही यह जीव सुखसन्तोष का अनुभव करता है। यही कारण है कि वह उसमें आसक्त हो जाता है। इस प्रकार शरीर मन और बुद्धि की दृष्टि से वह क्रमश बाह्य विषयों भावनाओं एवं विचारों के साथ बंध जाता है। ज्ञानी पुरुष इन सबसे मुक्त होता है।ज्ञानावस्थितचेतस नित्यानित्यवस्तु के विवेक के द्वारा नित्य स्वरूप को पहचान कर उसमें प्राप्त की हुई स्थिति के द्वारा ही विषयासक्ति के बंधन से मुक्ति हो सकती है।विवेकजनित विज्ञान के प्रकाश में अविद्या से उत्पन्न आसक्ति के नष्ट होने पर वह पूर्णत्व प्राप्त पुरुष वैषयिक प्रवृत्ति और अनैतिकता की शृंखलाओं से मुक्त हो जाता है। ऐसा पुरुष यज्ञ की अर्थात् निस्वार्थ सेवा और अर्पण की भावना से जीवन पर्यन्त कर्म करता रहता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ के लिये कर्म करने वाले पुरुष के सब कर्म लीन हो जाते हैं। अर्थात् वे नई वासनाएँ नहीं उत्पन्न करते।वेदों में प्रयुक्त यज्ञ शब्द को लेकर भगवान् श्रीकृष्ण ने यहाँ उसके अर्थ को और अधिक व्यापक रूप दिया है जिससे सम्पूर्ण विश्व में उसकी उपादेयता सिद्ध हो सके। केवल यज्ञयागादि ही नहीं बल्कि वे सब कर्म जो अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित न होकर सेवाभाव पूर्वक किये गये हों यज्ञ कर्म में ही समाविष्ट हैं।आगे के 6 श्लोकों में लगभग 12 प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया गया है जिसका आचरण प्रत्येक व्यक्ति सर्वत्र सभी परिस्थितियों में और अपने कार्यक्षेत्र में कर सकता है।क्या कारण है कि ज्ञानी पुरुष के कर्म प्रतिक्रया उत्पन्न किये बिना लीन हो जाते हैं इसका कारण बताते हुए कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
To one who is devoid of attchment, who is liberated, whose mind is established in knowledge, who works for the sake of sacrifice (for the sake of God), the whole action is dissolved.
Transliteration
gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacetasaḥ
yajñāyācarataḥ karma samagraṃ pravilīyateअनुवाद
जिसकी आसक्ति नष्ट हो गई है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, और जो यज्ञ के लिए आचरण (कर्म) करता है, उसके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।
भावार्थ
यह श्लोक एक मुक्त पुरुष की अवस्था का वर्णन करता है जो भौतिक आसक्तियों से रहित होकर कर्म करता है। चूँकि उसका मन आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिर होता है और वह केवल परमेश्वर (यज्ञ) को प्रसन्न करने के लिए कार्य करता है, इसलिए उसके कर्म कोई बंधन उत्पन्न नहीं करते। ऐसे व्यक्ति के सभी कर्म और उनके फल पूर्णतः विलीन हो जाते हैं, जिससे वह सदा मुक्त रहता है।
Translation
The actions of a person who is free from attachment, who is liberated, whose mind is situated in knowledge, and who acts for the sake of sacrifice, are completely dissolved.
Meaning
This verse explains the state of a liberated soul who performs actions without any material attachment. Because their mind is firmly established in spiritual knowledge and they act solely as an offering to the Supreme, their actions do not create any karmic bondage. Instead, all their actions and reactions completely dissolve, keeping them eternally free.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| गत | दूर हो गई है |
| सङ्गस्य | जिसकी आसक्ति |
| मुक्तस्य | मुक्त पुरुष के |
| ज्ञान | ज्ञान में |
| अवस्थित | स्थित |
| चेतसः | चित्त वाले के |
| यज्ञाय | यज्ञ के लिए |
| आचरतः | कर्म करने वाले के |
| कर्म | कर्म |
| समग्रम् | सम्पूर्ण |
| प्रविलीयते | विलीन हो जाते हैं |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| gata | freed from |
| saṅgasya | of attachment |
| muktasya | of the liberated one |
| jñāna | in knowledge |
| avasthita | situated |
| cetasaḥ | whose mind |
| yajñāya | for the sake of sacrifice |
| ācarataḥ | acting |
| karma | action |
| samagram | entirely |
| pravilīyate | dissolves |