श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.22

मूल श्लोक :

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो (कर्मयोगी) फलकी इच्छाके बिना अपनेआप जो कुछ मिल जाय उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अहंकार से परे आत्मस्वरूप में स्थित पुरुष इच्छा तथा फलासक्ति से प्रेरित होकर कर्म नहीं करता। कर्मों को करने से प्राप्त फल से ही वह सन्तुष्ट रहता है। अहंकाररहित अवस्था का अर्थ है अन्तकरण पर पूर्ण संयम। स्वभाविक ही शीतउष्ण सिद्धिअसिद्धि सुखदुख इत्यादि द्वन्द्वात्मक अनुभव उसे व्यथित नहीं कर सकते क्योंकि वे सब मन की बाह्यजगत् के साथ होने वाली प्रतिक्रियायें मात्र हैं।मन के प्रभावहीन होने पर बुद्धि अपने पूर्वाग्रह ईर्ष्या और मत्सर आदि से ज्ञानी पुरुष को प्रभावित नहीं कर सकती। सामान्यत सिद्धि में हमें हर्षातिरेक और असिद्धि में अत्यन्त विषाद होता है। परन्तु जब अविद्याजनित अहंकार पूर्णरूप से दैवी स्वरूप को प्राप्त हो जाता है तब वह पुरुष सफलता और असफलता में समान भाव से स्थित रहता है। ऐसा ज्ञानी पुरुष कर्म करके भी कर्मफलों से नहीं बंधता।जब आत्मज्ञानी पुरुष हमारे मध्य रहता हुआ कर्म करता है तब उसका व्यवहार सामान्य जनों के समान ही प्रतीत होता है तथापि उसके कर्मों में एक विशेष शक्ति और प्रभाव दिखाई पड़ता है जो उसे कर्मक्षेत्र में सामान्य से कहीं अधिक सफलता प्रदान करता है। श्रीकृष्ण के कथनानुसार ऐसे पुरुष को कर्मों का बंधन नहीं होता। सामान्य जनों को ज्ञानी पुरुष की इस उपलब्धि को समझने में कठिनाई होती है।जिस दैवी प्रेरणा एवं भावना से ज्ञानी पुरुष जगत् में कर्म करता है उसका वर्णन भगवान् अगले श्लोकों में करते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Content with what comes to him without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, though acting, he is not bound.

Transliteration

yadṛcchālābhasantuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ
samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate

अनुवाद

जो अपने आप प्राप्त हुए लाभ से संतुष्ट रहता है, जो द्वंद्वों से अतीत हो गया है, जो ईर्ष्या से रहित है, और जो सिद्धि तथा असिद्धि में समान रहता है, वह कर्म करके भी नहीं बंधता।

भावार्थ

भगवान कृष्ण एक मुक्त पुरुष की मानसिकता का वर्णन करते हैं जो बिना किसी आसक्ति के कर्म करता है। ऐसा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जो कुछ भी प्राप्त होता है, उसी में संतुष्ट रहता है और सुख-दुख जैसे द्वंद्वों तथा ईर्ष्या से मुक्त होता है। सफलता और विफलता दोनों में समान भाव रखने के कारण, वह कर्म करते हुए भी कर्मबंधनों में नहीं बंधता।

Translation

Satisfied with whatever comes by chance, having transcended the dualities, free from envy, and equal in success and failure, even while acting, he is not bound.

Meaning

Krishna describes the mindset of a truly liberated person who performs actions without attachment. Such a person accepts whatever comes naturally without excessive striving, remains unaffected by dualities like joy and sorrow, and harbors no envy. Because they maintain equanimity in both success and failure, their actions do not create karmic bondage.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यदृच्छालाभसन्तुष्टःअपने आप प्राप्त होने वाले लाभ से संतुष्ट
द्वन्द्वातीतःद्वंद्वों से मुक्त
विमत्सरःईर्ष्या से रहित
समःसमान
सिद्धौसफलता में
असिद्धौअसफलता में
चऔर
कृत्वाकर्म करके
अपिभी
ननहीं
निबध्यतेबंधता है

Word by word

WordMeaning
yadṛcchālābhasantuṣṭaḥsatisfied with gain coming of its own accord
dvandvātītaḥtranscended dualities
vimatsaraḥfree from envy
samaḥsteady
siddhauin success
asiddhauin failure
caand
kṛtvāhaving acted
apieven
nanever
nibadhyateis bound