श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.21

मूल श्लोक :

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल शरीरसम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

केवल शरीर द्वारा कर्म किए जाने से वासना के रूप में प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं हो सकती। वासनायें अन्तकरण में उत्पन्न होती हैं और उनकी उत्पत्ति का कारण कर्तृत्वाभिमान के साथ किए कर्म हैं। स्वार्थ के प्रबल होने पर ही ये वासनाएँ बन्धनकारक बनती हैं।आत्मा के साथ शरीर मन और बुद्धि इन अविद्याजनित उपाधियों के मिथ्या तादात्म्य से अहंकार उत्पन्न होता है। इस अहंकार की प्रतिष्ठा भविष्य की आशाओं तथा वर्तमान में प्राप्त विषयोपभोगजनित सन्तोष में है।इसलिए इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति (क) आशारहित है (ख) जिसने शरीर और मन को संयमित किया है (ग) जो सब परिग्रहों से मुक्त है उस व्यक्ति में इस मिथ्या अहंकार का कोई अस्तित्व शेष नहीं रह सकता। अहंकार के नष्ट होने पर केवल शरीर द्वारा किये गये कर्मों में यह सार्मथ्य नहीं होती कि वे अंतकरण में नये संस्कारों को उत्पन्न कर सकें।निद्रावस्था में किसी व्यक्ति के विवस्त्र हो जाने पर किसी प्रकार के अशोभनीय व्यवहार का आरोप नहीं किया जा सकता। निद्रा में यदि किसी व्यक्ति का पदाघात उसके अपने पुत्र को लगता है तो उस पर क्रूरता का आरोप भी नहीं हो सकता। क्योंकि उस समय शरीर में मैं नहीं था। इसका कारण है कि दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति में कर्तृत्त्व का अभिमान नहीं था। अत स्पष्ट है कि सभी प्रकार के दुख कष्ट बन्धन आदि केवल कर्तृत्वाभिमानी जीव को ही होते हैं और उसके अभाव में शारीरिक कर्मों में मनुष्य को बांधने की क्षमता नहीं होती है।आत्मानुभवी सन्त पुरुष के कर्म उसे स्पर्श तक नहीं कर सकते क्योंकि वह उनका कर्ता ही नहीं है कर्म केवल उसके द्वारा व्यक्त होते हैं। ऐसा महान् पुरुष कर्मों का कर्त्ता नहीं वरन् ईश्वर की इच्छा को व्यक्त करने का सर्वोत्तम करण अथवा माध्यम है।यदि वीणा से मधुर संगीत व्यक्त नहीं हो रहा हो तो श्रोतागण उस वाद्य पर आक्रमण नहीं करते यद्यपि वीणा वादक भी सुरक्षित नहीं रह सकता है  वीणा अपने आप मधुर ध्वनि को उत्पन्न नहीं करती परन्तु वादक की उंगलियों के स्पर्शमात्र से अपने में से संगीत को व्यक्त होने देती है। वादक की इच्छा और स्पर्श के अनुसार झुक जाने भर से उसका कर्त्तव्य समाप्त हो जाता है। अहंकार से रहित आत्मज्ञानी पुरुष भी वह श्रेष्ठतम माध्यम है जिसके द्वारा ईश्वर की इच्छा पूर्णरूप से प्रगट होती है। ऐसे पुरुष के कर्म उसके लिए पाप और पुण्य रूप बन्धन नहीं उत्पन्न कर सकते वह तो केवल माध्यम है।ज्ञानयोग में स्थित शरीर धारण के लिये आवश्यक कर्म करता हुआ पुरुष नित्य मुक्त ही है। भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Without hope and with the mind and the self controlled, having abandoned all covetousness, doing mere bodily action, he incurs no sin.

Transliteration

nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ
śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam

अनुवाद

जो आशारहित है, जिसके चित्त और आत्मा वश में हैं, और जिसने सभी प्रकार के परिग्रह (संग्रह) का त्याग कर दिया है, ऐसा मनुष्य केवल शरीर-निर्वाह संबंधी कर्म करता हुआ पाप को प्राप्त नहीं होता।

भावार्थ

जो व्यक्ति सभी प्रकार की इच्छाओं से मुक्त है, जिसने अपने मन और बुद्धि को पूरी तरह से वश में कर लिया है, और सभी संपत्तियों के स्वामित्व का त्याग कर दिया है, उसे कोई पाप नहीं लगता। ऐसा कर्मयोगी केवल शरीर के निर्वाह के लिए कर्म करता है और कर्मफलों के बंधन से मुक्त रहता है। यह श्लोक निष्काम कर्मयोग की सर्वोच्च अवस्था का वर्णन करता है।

Translation

Free from desires, with mind and self controlled, having abandoned all possessions, performing action merely for the maintenance of the body, he incurs no sin.

Meaning

A person who is free from desires, has complete control over their mind and intellect, and has renounced all sense of ownership, incurs no karmic reactions. By performing actions solely for the maintenance of the body without any attachment, they remain untainted by sin. This verse highlights the state of a true karma yogi who acts purely out of duty.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
निराशीःआशारहित
यतवश में किए हुए
चित्तमन
आत्माऔर अंतःकरण वाला
त्यक्तत्याग दिए हैं
सर्वसभी
परिग्रहःसंग्रह जिसने
शारीरम्शरीर संबंधी
केवलम्केवल
कर्मकर्म
कुर्वन्करता हुआ
नहीं
आप्नोतिप्राप्त होता है
किल्बिषम्पाप को

Word by word

WordMeaning
nirāśīḥfree from desires
yatacontrolled
cittamind
ātmāand self
tyaktahaving abandoned
sarvaall
parigrahaḥpossessions
śārīrambodily
kevalamonly
karmaaction
kurvanperforming
nanot
āpnotiincurs
kilbiṣamsin