श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.20

मूल श्लोक :

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है वह कर्मोंमें अच्छी तरहसे लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यहाँ हमें न कर्मफल त्यागने को कहा गया है और न ही उसकी उपेक्षा करने को किन्तु फल के साथ हमारी मानसिक दासता तथा आसक्ति का त्याग करने को कहा गया है। जब हम इच्छित फलों की चिन्ताओं से ग्रस्त हो जाते हैं तब हम अपने कर्मों को कुशलतापूर्वक नहीं कर पाते हैं। इस चिन्ता और आसक्ति का त्याग करके समाज कल्याण के लिए हमको प्रयत्नशील होना चाहिये।एक सच्चा कलाकार अपनी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति का कभी भी स्वेच्छा से विक्रय करने को तैयार नहीं होगा  जिस चित्र को चित्रित करने के लिए उसने इतना अधिक परिश्रम किया और समय दिया वह चित्र ही उसका वास्तविक पारितोषिक होता है। यदि भूखे भी रहना पड़े तो भी वह उस चित्र की बिक्री करना नहीं चाहेगा उस चित्र को देखने मात्र से उसे जो सन्तोष और आनन्द का अनुभव होता है उसकी तुलना में सम्पूर्ण जगत् की सम्पत्ति भी तुच्छ प्रतीत होती है। यदि एक लघु परिच्छिन्न कलाकृति उस सामान्य व्यक्ति को इतना अधिक आनन्द प्रदान कर सकती है तो आत्मस्वरूप में स्थित दैवी आनन्द की अनुभूति में रमे हुए नामरूपमय जगत् में काम करते हुए ज्ञानी पुरुष के आनन्द का क्या मापदण्ड हो सकता है  वास्तव में अनन्त तत्त्व को आत्मरूप से अनुभव किया हुआ पुरुष बाह्य आश्रयों से सर्वथा मुक्त हो जाता है।फलासक्ति असन्तोष तथा बाह्य वस्तुओं पर आश्रय  ये सब अविद्याजनित जीव के लिए ही होते हैं। यह जीव ही इन सबसे पीड़ित होता है। जब सत्य का साधक यह पहचान लेता है कि इस जीव का वास्तविक स्वरूप अनन्त और परिपूर्ण है तब यह जीवभाव (अहंकार) नष्ट हो जाता है और स्वभावत उसके सब दुखो का अन्त होना अवश्यंभावी है। पात्र में रखे हुये जल को हिलाने से उसमें स्थित सूर्य का प्रतिबिम्ब भी हिलता है। परन्तु जल को फेंक देने पर प्रतिबिम्ब लुप्त हो जाता है और फिर किसी भी प्रकार आकाश में स्थित सूर्य को हिलाया नहीं जा सकता । ऐसा आत्मज्ञानी पुरुष कर्म में प्रर्वत्त हुआ भी किञ्चिन्मात्र कर्म नहीं करता है।शरीर मन और बुद्धि बाह्य जगत् में कार्य करते रहते हैं किन्तु सर्वव्यापी आत्मा नहीं। इस चैतन्य आत्मा के बिना शरीर कार्य नहीं कर सकता परन्तु उसकी क्रिया का आरोप अकर्म आत्मा पर नहीं किया जा सकता है। अत आत्मस्वरूप में स्थित पुरुष कार्य करते हुए भी कर्त्ता नहीं कहा जा सकता। रेल चलती है परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा कि वाष्प गतिशील है।वेदान्त के शिक्षार्थी के मन में यह शंका उठती है कि आत्मानुभव होने पर ज्ञानी के पूर्वार्जित सभी कर्म नष्ट हो सकते हैं परन्तु तत्पश्चात् पुन जगत् में कर्म करने से हो सकता है कि वह नये पापपुण्यरूप कर्म करें जिसका फल भोगने हेतु उसे नए जन्मों को भी लेना पड़े। इस श्लोक में उपर्युक्त शंका को निर्मूल कर दिया गया है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ज्ञानी पुरुष कर्म करने पर भी किञ्चित कर्म नहीं करता है तब फिर उसे बन्धन कैसे होगा प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। सन्त पुरुष के शारीरिक कर्मों का भी कुछ तो फल होना ही चाहिये। यह सामान्य युक्तिवाद है जिसका खण्डन करते हुये भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Having abandoned attachment to the fruits of the action, ever content, depending on nothing, he does not do anything though engaged in activity.

Transliteration

tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ
karmaṇyabhipravṛtto'pi naiva kiñcitkaroti saḥ

अनुवाद

कर्म के फलों की आसक्ति को त्याग कर, जो नित्य तृप्त है और किसी पर आश्रित नहीं है, वह कर्मों में पूरी तरह प्रवृत्त होने पर भी वास्तव में कुछ नहीं करता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण निष्काम कर्मयोग की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं। जो व्यक्ति अपने कर्मों के फल की इच्छा को पूरी तरह से छोड़ देता है, वह भीतर से हमेशा संतुष्ट और स्वतंत्र रहता है। ऐसा ज्ञानी पुरुष संसार के सभी कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए भी वास्तव में कोई कर्म नहीं करता, क्योंकि उसके कर्म उसे किसी बंधन में नहीं डालते।

Translation

Having abandoned attachment to the fruits of action, always satisfied and independent, he does not do anything at all even though fully engaged in action.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the state of a perfect Karma Yogi. A person who has completely given up attachment to the results of their actions remains eternally satisfied and independent within. Even while being fully engaged in all worldly activities, such an enlightened person actually does nothing, as their actions do not create any karmic bondage.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
त्यक्त्वात्याग कर
कर्मफलासङ्गम्कर्म के फलों की आसक्ति को
नित्यतृप्तःहमेशा संतुष्ट
निराश्रयःआश्रय रहित
कर्मणिकर्म में
अभिप्रवृत्तःपूरी तरह लगा हुआ
अपिभी
ननहीं
एवनिश्चय ही
किञ्चित्कुछ भी
करोतिकरता है
सःवह

Word by word

WordMeaning
tyaktvāhaving abandoned
karmaphalāsaṅgamattachment to the fruits of action
nityatṛptaḥalways satisfied
nirāśrayaḥwithout dependence
karmaṇiin action
abhipravṛttaḥfully engaged
apieven though
nanot
evacertainly
kiñcitanything
karotidoes
saḥhe