श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.17

मूल श्लोक :

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये क्योंकि कर्मकी गति गहन है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जीवन क्रियाशील है। क्रिया की समाप्ति ही मृत्यु का आगमन है। क्रियाशील जीवन में ही हम उत्थान और पतन को प्राप्त हो सकते हैं। एक स्थान पर स्थिर जल सड़ता और दुर्गन्ध फैलाता है जबकि सरिता का प्रवाहित जल सदा स्वच्छ और शुद्ध बना रहता है। जीवन शक्ति की उपस्थिति में कर्मो का आत्यन्तिक अभाव नहीं हो सकता।चूँकि मनुष्य को जीवनपर्यन्त क्रियाशील रहना आवश्यक है इसलिये प्राचीन मनीषियों ने जीवन के सभी सम्भाव्य कर्मों का अध्ययन किया क्योंकि वे जीवन का मूल्यांकन उसके पूर्णरूप में करना चाहते थे। निम्नांकित तालिका में उनके द्वारा किये गये कर्मों का वर्गीकरण दिया हुआ है।क्रिया ही जीवन है। निष्क्रियता से उन्नति और अधोगति दोनों ही सम्भव नहीं। गहन निद्रा अथवा मृत्यु की कर्म शून्य अवस्था मनुष्य के विकास में न साधक है न बाधक।कर्म के क्षण मनुष्य का निर्माण करते हैं। यह निर्माण इस बात पर निर्भर करता है कि हम कौन से कर्मों को अपने हाथों में लेकर करते हैं। प्राचीन ऋषियों के अनुसार कर्म दो प्रकार के होते हैं  निर्माणकारी (कर्तव्य) और विनाशकारी (निषिद्ध)। इस श्लोक के कर्म शब्द में मनुष्य के विकास में साधक के निर्माणकारी कर्तव्य कर्मों का ही समावेश है। जिन कर्मों से मनुष्य अपने मनुष्यत्व से नीचे गिर जाता है उन कर्मों को यहाँ विकर्म कहा है जिन्हें शास्त्रों ने निषिद्ध कर्म का नाम दिया है।कर्तव्य कर्मों का फिर तीन प्रकार से वर्गीकरण किया गया है और वे हैं नित्य नैमित्तिक और काम्य। जिन कर्मों को प्रतिदिन करना आवश्यक है वे नित्य कर्म तथा किसी कारण विशेष से करणीय कर्मों को नैमित्तिक कर्म कहा जाता है। इन दो प्रकार के कर्मों को करना अनिवार्य है। किसी फल विशेष को पाने के लिए उचित साधन का उपयोग कर जो कर्म किया जाता है उसे काम्य कर्म कहते हैं जैसे पुत्र या स्वर्ग पाने के लिये किया गया कर्म। यह सबके लिये अनिवार्य नहीं होता।आत्मविकास के लिये विकर्म का सर्वथा त्याग और कर्तव्य का सभी परिस्थितियों में पालन करना चाहिये। वैज्ञानिक पद्धति से किये हुए इस विश्लेषण में श्रीकृष्ण अकर्म की पूरी तरह उपेक्षा करते हैं।यह आवश्यक है कि अपने भौतिक अभ्युदय तथा आध्यात्मिक उन्नति के इच्छुक साधक कर्मों के इस वर्गीकरण को भली प्रकार समझें।भगवान् श्रीकृष्ण इस बात को स्वीकार करते हैं कि कर्मों के इस विश्लेषण के बाद भी सामान्य मनुष्य को कर्मअकर्म का विवेक करना सहज नहीं होता क्योंकि कर्म की गति गहन है।उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट होता है कि कर्म का मूल्यांकन केवल उसके वाह्य स्वरूप को देखकर नहीं बल्कि उसके उद्देश्य को भी ध्यान में रखते हुये करना चाहिये। उद्देश्य की श्रेष्ठता एवं शुचिता से उस व्यक्ति विशेष के कर्म श्रेष्ठ एवं पवित्र होंगे। इस प्रकार कर्म के स्वरूप का निश्चय करने में जब व्यक्ति का इतना प्राधान्य है तो भगवान् का यह कथन है कि कर्म की गति गहन है अत्यन्त उचित है।कर्म और अकर्म के विषय में और विशेष क्या जानना है इस पर कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

For verily (the true nature) of action (enjoined by the scriptures) should be known, also (that) 
of forbidden (or unlawful) action, and of inaction; hard to understand is the nature (path) of action.

Transliteration

karmaṇo hyapi boddhavyaṃ boddhavyaṃ ca vikarmaṇaḥ
akarmaṇaśca boddhavyaṃ gahanā karmaṇo gatiḥ

अनुवाद

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, विकर्म (निषिद्ध कर्म) का स्वरूप भी जानना चाहिए, और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए। कर्म की गति अत्यंत गहन है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कर्म की जटिलता को समझाते हैं। मनुष्य को विहित कर्म, विकर्म (निषिद्ध कर्म) और अकर्म (कर्म न करना) के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। कर्म की गति और उसके परिणाम अत्यंत गूढ़ हैं, जिन्हें समझना साधारण मनुष्य के लिए बहुत कठिन है।

Translation

The nature of prescribed action must be understood, the nature of forbidden action must be understood, and the nature of inaction must also be understood. The path of action is profound.

Meaning

In this verse, Lord Krishna emphasizes the complexity of action. One must clearly distinguish between prescribed duties, forbidden actions, and inaction. The true nature and consequences of action are extremely deep and difficult for the ordinary mind to comprehend.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
कर्मणःकर्म का
हिनिश्चित रूप से
अपिभी
बोद्धव्यम्जानना चाहिए
बोद्धव्यम्जानना चाहिए
चऔर
विकर्मणःविकर्म (निषिद्ध कर्म) का
अकर्मणःअकर्म का
चऔर
बोद्धव्यम्जानना चाहिए
गहनागहन (समझने में कठिन)
कर्मणःकर्म की
गतिःगति (रहस्य)

Word by word

WordMeaning
karmaṇaḥof action
hicertainly
apialso
boddhavyamshould be known
boddhavyamshould be known
caand
vikarmaṇaḥof forbidden action
akarmaṇaḥof inaction
caand
boddhavyamshould be known
gahanāprofound
karmaṇaḥof action
gatiḥpath