श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.16

मूल श्लोक :

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

कर्म क्या है और अकर्म क्या है  इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्मतत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा जिसको जानकर तू अशुभ(संसारबन्धन)से मुक्त हो जायगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

सामान्य दृष्टि से हम किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रिया को कर्म और वैसी क्रिया के अभाव को अकर्म समझते है। दैनिक जीवन के कार्यकलापों के सन्दर्भ में यह परिभाषा योग्य ही है। परन्तु दर्शनशास्त्र के दृष्टिकोण से कर्म और अकर्म के लक्षण भिन्न है।आत्मविकास की दृष्टि से कर्म का तात्पर्य केवल उसका स्थूल रूप जो शरीर द्वारा व्यक्त होता है नहीं समझना चाहिये किन्तु उसके साथ ही उसी कर्म के पीछे जो सूक्ष्म उद्देश्य है उसे भी ध्यान में रखना आवश्यक है। कर्म अपने आप में न अच्छा होता है और न बुरा। कर्म के उद्देश्य से कर्म का स्वरूप निश्चित किया जाता है। जैसे किसी फल की सुन्दरता से ही हम नहीं कह सकते कि वह खाने योग्य है अथवा नहीं क्योंकि वह तो उस फल में निहित तत्त्वों पर निर्भर करता है। उसी प्रकार अत्यन्त श्रेष्ठ प्रतीत होने वाले कर्म भी अपराधपूर्ण हो सकते हैं यदि उनका उद्देश्य निम्नस्तरीय और पापपूर्ण हो।इसलिये यहाँ कहा गया है कि कर्मअकर्म का विवेक करने में कवि लोग भी मोहित होते हैं। आजकल कविता लिखने वाले व्यक्ति को ही कवि कहा जाता है किन्तु पूर्व काल में उपनिषदों के मन्त्र द्रष्टा ऋषियों के लिये अथवा बुद्धिमान् पुरुषों के लिये यह शब्द प्रयुक्त होता था। प्रेरणा प्राप्त कोई भी पुरुष जो श्रेष्ठ सत्य को उद्घाटित करता था सिद्धकवि कहा जाता था।कर्मअकर्म की कठिन समस्या की ओर संकेत करके श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि वे उसे कर्मअकर्म का तत्त्व समझायेंगे जिसे जानकर मनुष्य स्वयं को सांसारिक बन्धनों से मुक्त कर सकता है।यह सर्वविदित है कि कोई भी क्रिया कर्म है और क्रिया का अभाव  शान्त बैठना अकर्म है। इसके विषय में और अधिक जानने योग्य क्या बात है  इस पर कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

What is action? What is inaction? As to this even the wise are confused. Therefore I shall teach thee such action (the nature of action and inaction) by knowing which thou shalt be liberated from the evil (of Samsara, the wheel of birth and death).

Transliteration

kiṃ karma kimakarmeti kavayo'pyatra mohitāḥ
tatte karma pravakṣyāmi yajjñātvā mokṣyase'śubhāt

अनुवाद

कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में बुद्धिमान लोग भी मोहित हो जाते हैं। मैं तुम्हें वह कर्म भलीभाँति बताऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बंधन) से मुक्त हो जाओगे।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को कर्म की गहनता समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि कर्म और अकर्म का सही स्वरूप समझना इतना कठिन है कि बड़े-बड़े विद्वान भी इसमें भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए, कृष्ण स्वयं उस कर्म के रहस्य को उजागर करने का वचन देते हैं, जिसे जानकर मनुष्य संसार के सभी अशुभ बंधनों से मुक्त हो सकता है।

Translation

What is action and what is inaction? Even the wise are deluded in this matter. I shall explain that action to you, knowing which you will be liberated from evil.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the profound nature of action to Arjuna. He states that the true essence of action and inaction is so difficult to comprehend that even great scholars and wise men are bewildered by it. Therefore, Krishna promises to reveal the secret of action, knowing which one can be liberated from all the inauspicious bondage of the material world.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
किम्क्या
कर्मकर्म
किम्क्या
अकर्मअकर्म
इतिइस प्रकार
कवयःबुद्धिमान लोग
अपिभी
अत्रइस विषय में
मोहिताःमोहित हैं
तत्वह
तेतुम्हें
कर्मकर्म
प्रवक्ष्यामिमैं भलीभाँति कहूँगा
यत्जिसे
ज्ञात्वाजानकर
मोक्ष्यसेतुम मुक्त हो जाओगे
अशुभात्अशुभ से

Word by word

WordMeaning
kimwhat
karmaaction
kimwhat
akarmainaction
itithus
kavayaḥthe wise
apieven
atrain this matter
mohitāḥare deluded
tatthat
teto you
karmaaction
pravakṣyāmiI shall explain
yatwhich
jñātvāhaving known
mokṣyaseyou will be liberated
aśubhātfrom evil