Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.14
मूल श्लोक :
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस(सृष्टिरचना आदि) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
नित्य शुद्ध और परिपूर्ण आत्मा को किसी प्रकार की अपूर्णता का भान नहीं हो सकता जो किसी इच्छा को जन्म दे। इस दृष्टि से श्रीकृष्ण भगवान् कहते हैं कर्म मुझे दूषित नहीं कर सकते और न मुझे कर्मफल में कोई आसक्ति ही है। इच्छा अथवा कर्म का बन्धन जीवअहंकार के लिये ही हो सकता है। मन और बुद्धि की उपाधियों से युक्त चैतन्य आत्मा ही जीव कहा जाता है। इन उपाधियों के दोषयुक्त होने पर जीव ही दूषित हुआ समझा जाता है। इसे एक दृष्टान्त के द्वारा हम भली भांति समझ सकेंगे।यदि किसी पात्र में रखे जल में सूर्य प्रतिबिम्वित होता है तो उस प्रतिबिम्ब की स्थिति पूर्णतया उस जल की स्थिति पर निर्भर करती है। जल के शान्त अस्थिर अथवा मैले होने पर वह प्रतिबिम्ब भी स्थिर क्षुब्ध अथवा धुंधला दिखाई देगा। परन्तु महाकाश स्थित वास्तविक सूर्य पर इस चंचलता अथवा निश्चलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार इच्छा आसक्ति आदि का प्रभाव अहंकार पर ही पड़ता है। नित्य मुक्त चैतन्य स्वरूप आत्मा इन सबसे किसी प्रकार भी दूषित नहीं होती।आत्मविकास की वैदिक साधना का यह अर्थ नवीन प्रतीत होता है। क्या इसके पूर्व किसी ने इसका आचरण किया था उत्तर है
English Translation By Swami Sivananda
Actions do not taint Me, nor have I a desire for the fruit of actions. He who knows Me thus is not bound by actions.
Transliteration
na māṃ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā
iti māṃ yo'bhijānāti karmabhirna sa badhyateअनुवाद
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और न ही मेरी कर्मफल में कोई स्पृहा (इच्छा) है। जो मुझे इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह कर्मों द्वारा नहीं बंधता है।
भावार्थ
भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि वे सृष्टि की रचना और संचालन जैसे महान कर्म करते हैं, फिर भी वे उन कर्मों से बंधते नहीं हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें अपने कर्मों के फलों की कोई लालसा नहीं है। जो मनुष्य भगवान के इस दिव्य स्वभाव को समझ लेता है और उसी निष्काम भाव को अपनाता है, वह भी सांसारिक कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
Translation
Actions do not taint Me, nor do I have any desire for the fruits of action. One who knows Me thus is not bound by actions.
Meaning
Lord Krishna clarifies that although He performs cosmic actions like the creation and maintenance of the universe, He is never entangled by them. This is because He has no attachment to or desire for the results of His actions. A person who truly understands this divine nature of the Lord and adopts the same spirit of detachment is also freed from the bondage of karma.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| माम् | मुझे |
| कर्माणि | कर्म |
| लिम्पन्ति | लिप्त करते हैं |
| न | नहीं |
| मे | मेरी |
| कर्मफले | कर्म के फल में |
| स्पृहा | इच्छा |
| इति | इस प्रकार |
| माम् | मुझे |
| यः | जो |
| अभिजानाति | भली-भांति जानता है |
| कर्मभिः | कर्मों के द्वारा |
| न | नहीं |
| सः | वह |
| बध्यते | बंधता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| mām | me |
| karmāṇi | actions |
| limpanti | taint |
| na | not |
| me | my |
| karmaphale | in the fruit of action |
| spṛhā | desire |
| iti | thus |
| mām | me |
| yaḥ | who |
| abhijānāti | knows |
| karmabhiḥ | by actions |
| na | not |
| saḥ | he |
| badhyate | is bound |