Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.12
मूल श्लोक :
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
कर्मोंकी सिद्धि (फल) चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं क्योंकि इस मनुष्यलोकमें कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
सुकर्म अथवा दुष्कर्म करने के लिये आत्म चैतन्य अथवा ईश्वर की शक्ति की समान रूप से आवश्यकता है और वह उपलब्ध भी है। परन्तु मन की प्रवृत्ति बहिर्मुखी ही बनी रहने के कारण है इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होने पर निम्न स्तर के सुख की संवेदनाओं में उसकी आसक्ति। इस प्रकार के सुख सरलता से प्राप्त भी हो जाते हैं।अनेक प्रयत्नों के बावजूद हम वैषयिक सुख में ही रमते हैं जिसका कारण भगवान् बताते हैं मनुष्य लोक में कर्म की सिद्धि शीघ्र ही होती है।इस जगत् में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाना सामान्य मनुष्य के लिये सरल प्रतीत होता है। वह सुख निकृष्ट होने पर भी बिना किसी प्रतिरोध के मिलता है और इस कारण सुख शान्ति की इच्छा करने वाला पुरुष अपनी आध्यात्मिक शक्ति को व्यर्थ ही इन वस्तुओं की प्राप्ति और भोग करने में खो देता है। इस कथन के सत्यत्व का हम सबको अनुभव है।उपर्युक्त विवरण का सम्बन्ध केवल लौकिक सामान्य भोगों में ही सीमित नहीं वरन् हमारी अन्य उपलब्धियों से भी है। वनस्पति एवं पशु जगत् की अपेक्षा हम सुनियोजित कर्मों के द्वारा प्रकृति को अपने लिये अधिक सुख प्रदान करने को बाध्य कर सकते हैं।जीवन के उत्कृष्ट एवं निकृष्ट मार्गों का अनुसरण करने वाले लोगों को हम उनकी अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के आधार पर विभाजित कर सकते हैं इन बहिर्मुखी लोगों का फिर चार प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है जिसका आधार है उनके विचार (गुण) और कर्म।
English Translation By Swami Sivananda
Those who long for success in action in this world sacrifice to the gods; because success is ickly attained by men through action.
Transliteration
kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ
kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajāअनुवाद
इस मनुष्य लोक में कर्मों की सिद्धि चाहने वाले देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि लोग सकाम कर्मों में क्यों लगे रहते हैं। भौतिक इच्छाओं की पूर्ति और कार्यों में शीघ्र सफलता पाने के लिए मनुष्य विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं। इस मनुष्य लोक में भौतिक कर्मों का फल बहुत जल्दी प्राप्त होता है, इसलिए लोग भगवान की अनन्य भक्ति के बजाय देवताओं की ओर आकर्षित होते हैं।
Translation
Those who desire success in their actions here worship the demigods, for success born of action comes quickly in the human world.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains why people engage in fruitive activities. Desiring quick fulfillment of material desires and success in their endeavors, humans worship various demigods. Because the results of material actions are attained very quickly in this human world, people are drawn to such worship rather than the unalloyed devotion to the Supreme Lord.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| काङ्क्षन्तः | चाहने वाले |
| कर्मणाम् | कर्मों की |
| सिद्धिम् | सफलता को |
| यजन्ते | पूजा करते हैं |
| इह | यहाँ (इस संसार में) |
| देवताः | देवताओं की |
| क्षिप्रम् | शीघ्र |
| हि | निश्चित रूप से |
| मानुषे | मनुष्य |
| लोके | लोक में |
| सिद्धिः | सफलता |
| भवति | होती है |
| कर्मजा | कर्म से उत्पन्न |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| kāṅkṣantaḥ | desiring |
| karmaṇām | of actions |
| siddhim | success |
| yajante | worship |
| iha | here (in this world) |
| devatāḥ | the demigods |
| kṣipram | quickly |
| hi | certainly |
| mānuṣe | in human |
| loke | world |
| siddhiḥ | success |
| bhavati | comes |
| karmajā | born of action |