श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.11

मूल श्लोक :

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पृथानन्दन जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् में राग द्वेष आदि की दुर्बलताओं का आरोप उचित नहीं है। वे तो शक्तिपुञ्ज हैं जो समस्त कर्मों एवं उपलब्धियों का मूल है। उस ईश्वर की शक्ति का आह्वान करने के लिये हमें उपाधियाँ दी गयी हैं। बुद्धिमत्ता पूर्वक यदि इन उपाधियों का तथा शक्ति का हम उपयोग करें तो निश्चय ही लक्ष्य को पा सकते हैं अन्यथा वही शक्ति हमारे नाश का कारण बन सकती है।यन्त्रों की सहायता से पेट्रोल की ईन्धन शक्ति को अश्वशक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। उस परिवर्तित शक्ति का उपयोग करके वाहन द्वारा हम अपने गन्तव्य तक पहुँच सकते हैं अथवा किसी वृक्ष आदि से टक्कर मारकर अपनी हड्डियाँ भी चूरचूर कर सकते हैं  इस प्रकार की दुर्घटनायें वाहन चालकों की असावधानी के कारण होती हैं। यद्यपि जिस वेग से वाहन टकराया उस वेग को उसने पेट्रोल से ही प्राप्त किया था। हम यह नहीं कह सकते कि जो लोग लक्ष्य तक पहुँच गये उनके प्रति पेट्रोल को राग था और दुर्घटनाग्रस्त लोगों से द्वेष। बिना किसी पक्षपात के पेट्रोल अपनी शक्ति प्रदान करता है परन्तु यन्त्रों द्वारा उसका सदुपयोग अथवा दुरुपयोग करना हमारी अपनी बुद्धि पर निर्भर करता है। यही बात विद्युत् शक्ति के सम्बन्ध में भी समझनी चाहिये। विद्युत् की अभिव्यक्ति विभिन्न उपकरणों में विभिन्न प्रकार से होती है वह उन सब उपकरणों का गुण धर्म है और न कि विद्युत शक्ति का।इसी प्रकार भगवान् यहाँ कहते हैं जो मुझे जैसा भजते हैं मैं उन पर वैसी ही कृपा करता हूँ। जिस रूप में हम ईश्वर का आह्वान करेंगे उसी रूप में वे हमारी इच्छा को पूर्ण करेंगे।यदि भगवान् पक्षपातादि अवगुणों से सर्वथा मुक्त हैं तो उनकी कृपा सब पर एक समान ही होगी फिर सामान्य मनुष्य भगवान् की शरण में न जाकर अन्य विषयों की ही क्यों इच्छा करते हैं  इस प्रश्न का उत्तर है

English Translation By Swami Sivananda

In whatever way men approach Me even so do I reward them; My path do men tread in all ways, O Arjuna.

Transliteration

ye yathā māṃ prapadyante tāṃstathaiva bhajāmyaham
mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ

अनुवाद

हे पार्थ! जो लोग जिस भाव से मेरी शरण ग्रहण करते हैं, मैं भी उन्हें उसी के अनुरूप फल देता हूँ। मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे सभी के प्रति समभाव रखते हैं। जो भक्त जिस इच्छा या भाव से भगवान की उपासना करता है, भगवान उसे उसी रूप में स्वीकार कर फल प्रदान करते हैं। अंततः, चाहे कोई किसी भी मार्ग या देवता का अनुसरण करे, वह परोक्ष या अपरोक्ष रूप से परमात्मा के ही मार्ग पर चल रहा होता है।

Translation

O Partha, in whatever way people surrender unto me, I reward them accordingly. Human beings follow my path in all respects.

Meaning

In this verse, Lord Krishna declares his absolute impartiality and perfect reciprocation with all souls. He explains that he rewards devotees exactly according to the nature and degree of their surrender to him. Ultimately, everyone is seeking the Supreme, and all paths of spiritual pursuit or material desire are simply different ways of following His universal path.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
येजो
यथाजिस प्रकार
माम्मेरी
प्रपद्यन्तेशरण लेते हैं
तान्उनको
तथाउसी प्रकार
एवही
भजामिभजता हूँ
अहम्मैं
मममेरे
वर्त्ममार्ग का
अनुवर्तन्तेअनुसरण करते हैं
मनुष्याःमनुष्य
पार्थहे पार्थ
सर्वशःसब प्रकार से

Word by word

WordMeaning
yewho
yathāin whatever way
māmme
prapadyantesurrender
tānthem
tathāin that way
evacertainly
bhajāmireward
ahamI
mamamy
vartmapath
anuvartantefollow
manuṣyāḥhuman beings
pārthaO Partha
sarvaśaḥin all respects