Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.10
मूल श्लोक :
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
राग भय और क्रोधसे सर्वथा रहित मेरेमें ही तल्लीन मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुतसे भक्त मेरे भाव(स्वरूप) को प्राप्त हो चुके हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस श्लोक में अध्यात्म साधना एवं साध्य दोनों को ही स्पष्टरूप से बताया गया है किसी भी साधक के लिये राग और उसके कार्यों का त्याग किये बिना कोई उन्नति करना संभव नहीं क्योंकि वे सदैव उसके मार्ग में बाधा उत्पन्न करते रहते हैं। एक बार मन इनसे उत्पन्न विक्षेपों से रहित होकर शान्त और स्थिरचित्त हो जाता है तब पूर्णत्व की स्थिति उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य होती है जो उसे आगे बढ़ने के लिये उत्साहित करती है। आत्मविकास की इस स्थिति पर पहुँचने पर उस साधक को शास्त्राध्ययन की योग्यता प्राप्त होती है।उपनिषदों में वर्णित आत्मप्राप्ति की साधना इस प्रकार है (क) गुरु के चरणों के पास बैठकर वेदान्त का श्रवण (ख) श्रवण किये हुए विषय पर युक्ति पूर्वक मनन और (ग) इस प्रकार जाने हुए आत्मतत्त्व का निदिध्यासन अर्थात् ध्यान। वेदान्त के सिद्धान्त का अध्ययन और उस ज्ञान के अनुसार जीवन में आचरण करने को ही इस श्लोक में ज्ञानतप कहा गया।कुछ व्याख्याकारों के मतानुसार इस श्लोक में कर्म भक्ति एवं ज्ञान इन तीनों योगों के समुच्चय का उपदेश दिया गया है। कैसे उनके अनुसार कर्मयोग की भावना से अपने कार्य क्षेत्र में कर्म किये बिना राग भय और क्रोध निवृत्ति नहीं हो सकती। मन्मया और मामुपाश्रिता अर्थात् मुझमें स्थित और मेरे शरण हुए इन शब्दों में भक्तियोग का संकेत है क्योंकि ईश्वर की शरण में गया हुआ भक्त भगवान् के साथ में एकरूप हो जाता है। आत्मानात्मविवेक करके आत्मा के साथ तादात्म्य रखने के प्रयत्न को ज्ञानयोग कहते हैं जिसे यहाँ ज्ञानतप कहा गया है। इन सबका निष्कर्ष यह है कि भिन्नभिन्न प्रतीत होने वाले साधना मार्गों का अनुसरण करने पर साघकगण मुझ परमात्मा को ही प्राप्त होते हैं।वास्तव में देखा जाय तो ये समस्त साधनामार्ग मन को साधन सम्पन्न बनाने के लिये ही हैं जिसे शास्त्रीय भाषा में अन्तकरण शुद्धि कहते हैं। हममें से कुछ लोगों का अपनी देह के साथ अत्यधिक तादात्म्य होता है। कुछ व्यक्ति अधिक भावुक होते हैं तो अन्य लोग बुद्धिवादी। इन सबके लिये एक ही प्रकार के साधन का उपदेश करने पर इस बात की सम्भावना रहती है कि उसे सार्वभौमिक स्वीकृति न मिले तथा सबके लिये उसकी उपयोगिता सिद्ध न हो सके।यह स्पष्ट है कि साधना मार्गों में विविधता होने पर भी सभी साधकों का आत्मानुभव एक ही है। यह एक विवादरहित तथ्य है क्योंकि विश्व के आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन करने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रत्येक सन्त ने अपने पूर्वकालीन साहित्य से विचारों को लेकर उनकी नयी प्रति प्रस्तुत कर दी हो इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान् रागद्वेषवान् हैं क्योंकि वे किसी को मोक्ष प्रदान करते हैं और अन्यों को नहीं। इस पर कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Freed from attachment, fear and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of knowledge, many have attained to My Being.
Transliteration
vītarāgabhayakrodhā manmayā māmupāśritāḥ
bahavo jñānatapasā pūtā madbhāvamāgatāḥअनुवाद
आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त, मुझमें पूर्णतया तल्लीन और मेरी ही शरण में आए हुए बहुत से लोग ज्ञान रूपी तपस्या से पवित्र होकर मेरे दिव्य भाव को प्राप्त हो चुके हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि उन्हें प्राप्त करना कोई नया या असंभव मार्ग नहीं है। अतीत में भी ऐसे अनेक साधक हुए हैं जिन्होंने स्वयं को सांसारिक आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त कर लिया और पूर्ण रूप से भगवान की शरण ग्रहण की। ज्ञान रूपी तपस्या से अपने अंतःकरण को शुद्ध करके उन्होंने भगवान के दिव्य स्वरूप और सर्वोच्च प्रेम को प्राप्त किया है।
Translation
Freed from attachment, fear, and anger, fully absorbed in Me, and taking refuge in Me, many persons, purified by the austerity of knowledge, have attained My transcendental nature.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains that attaining Him is not a new or impossible path. Throughout history, many seekers who freed themselves from worldly attachments, fear, and anger have taken complete refuge in Him. By purifying their consciousness through the fire of spiritual knowledge, they have successfully attained His divine nature and supreme love.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| वीतरागभयक्रोधाः | आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त |
| मन्मयाः | मुझमें तल्लीन |
| माम् | मेरी |
| उपाश्रिताः | शरण में आए हुए |
| बहवः | बहुत से |
| ज्ञानतपसा | ज्ञान रूपी तपस्या से |
| पूताः | पवित्र होकर |
| मद्भावम् | मेरे दिव्य भाव को |
| आगताः | प्राप्त हुए हैं |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| vītarāgabhayakrodhāḥ | freed from attachment, fear, and anger |
| manmayāḥ | fully absorbed in Me |
| mām | Me |
| upāśritāḥ | taking refuge |
| bahavaḥ | many |
| jñānatapasā | by the penance of knowledge |
| pūtāḥ | purified |
| madbhāvam | My transcendental nature |
| āgatāḥ | have attained |