Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.9
मूल श्लोक :
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचरHindi Translation By Swami Ramsukhdas
यज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है इसलिये हे कुन्तीनन्दन तू आसक्तिरहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्यकर्म कर।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
प्रत्येक कर्म कर्त्ता के लिये बन्धन उत्पन्न नहीं करता। केवल अविवेकपूर्वक किये हुये कर्म ही मन में वासनाओं की वृद्धि करके परिच्छिन्न अहंकार और अपरिच्छिन्न आत्मस्वरूप के मध्य एक अभेद्य दीवार खड़ी कर देते हैं। वासनाओं से पूर्ण अन्तकरण वाले व्यक्ति में दिव्यत्व का कोई प्रकाश नहीं दिखाई देता। पारम्परिक अर्थानुसार यज्ञ के अतिरिक्त जो अन्य कर्म हैं वे वासनाओं को उत्पन्न कर व्यक्ति के विकास में अवरोधक बन जाते हैं।यहां यज्ञ शब्द का अर्थ है वे सब कर्म जिन्हें मनुष्य निस्वार्थ भाव एवं समर्पण की भावना से विश्व के कल्याण के लिये करता है। ऐसे कर्म व्यक्ति के पतन में नहीं वरन् उत्थान में ही सहायक होते हैं। यज्ञ शब्द का उपर्युक्त अर्थ समझ लेने पर आगे के श्लोक और अधिक स्पष्ट होंगे और उनमें उपदिष्ट ज्ञान सम्पूर्ण विश्व के उपयुक्त होगा।जब समाज के लोग आगे आकर परस्पर सहयोग एवं समर्पण की भावना से कर्म करेंगे केवल तभी वह समाज दारिद्रय और दुखों के बन्धनों से मुक्त हो सकता है यह एक ऐतिहासिक सत्य है। ऐसे कर्मों का सम्पादन अनासक्ति के होने से ही संभव होगा। अर्जुन में यह दोष आ गया था कि वह विरुद्ध पक्ष के व्यक्तियों के साथ अत्यन्त आसक्त हो गया और परिणामस्वरूप परिस्थिति को ठीक समझ नहीं पाया इसलिये समसामयिक कर्तव्य का त्याग कर कर्मक्षेत्र से पलायन करने की उसकी प्रवृत्ति हो गयी।कर्ममार्ग के अधिकारी व्यक्ति को निम्नलिखित कारणों से भी कर्म करना चाहिये
English Translation By Swami Sivananda
The world is bound by actions other than those performed for the sake of sacrifice; do thou, therefore, O son of Kunti (Arjuna), perform action for that sake (for sacrifice alone), free from attachment.
Transliteration
yajñārthāt karmaṇo'nyatra loko'yaṃ karmabandhanaḥ
tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācaraअनुवाद
यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्मों में लगा हुआ यह संसार कर्मों से बंधता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! तुम आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के लिए ही भली-भांति कर्म करो।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत समझा रहे हैं। वे बताते हैं कि जो कर्म यज्ञ (ईश्वर की प्रसन्नता) के लिए नहीं किए जाते, वे मनुष्य को संसार के बंधन में डाल देते हैं। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह फल की आसक्ति को त्याग कर केवल ईश्वर को समर्पित करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करे।
Translation
This world is bound by action other than action done for the sake of sacrifice. Therefore, O son of Kunti, perform action for that purpose, free from attachment.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the principle of selfless action to Arjuna. He states that any action not performed as a sacrifice to the Supreme Lord binds the doer to the material world. Therefore, one must perform their prescribed duties without attachment to the results, dedicating them entirely to the Divine.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यज्ञार्थात् | यज्ञ के निमित्त |
| कर्मणः | कर्म से |
| अन्यत्र | अन्य (अतिरिक्त) |
| लोकः | संसार |
| अयम् | यह |
| कर्मबन्धनः | कर्मों से बंधने वाला है |
| तदर्थम् | उस (यज्ञ) के लिए |
| कर्म | कर्म |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र |
| मुक्तसङ्गः | आसक्ति से मुक्त होकर |
| समाचर | भली-भांति करो |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yajñārthāt | for the sake of sacrifice |
| karmaṇaḥ | action |
| anyatra | other than |
| lokaḥ | world |
| ayam | this |
| karmabandhanaḥ | bound by action |
| tadartham | for that sake |
| karma | action |
| kaunteya | O son of Kunti |
| muktasaṅgaḥ | free from attachment |
| samācara | perform perfectly |