Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.7
मूल श्लोक :
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे अर्जुन जो मनुष्य मनसे इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करके आसक्तिरहित होकर (निष्काम भावसे) समस्त इन्द्रियोंके द्वारा कर्मयोगका आचरण करता है वही श्रेष्ठ है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
सरलसी प्रतीत होने वाली इन दो पंक्तियों में सही कर्म एवं जीवन जीने की कला का सम्पूर्ण ज्ञान सन्निहित है। आधुनिक जगत् को विचारों की सूत्ररूपता (अर्थात् कम शब्दों में अधिक अर्थ बताना) का ज्ञान नहीं है जबकि प्राचीन सूत्रकारों ने अपने विचारों से ऐसे भारत का निर्माण किया जहाँ आध्यात्मिक संस्कृति विकसित हुई और राष्ट्र ने स्वर्णयुग का अवलोकन किया।मन का अस्तित्व एवं पोषण पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ग्रहण की हुई बाह्य जगत् की विषय संवेदनाओं से होता है। मन की वृत्ति इन्द्रियों के माध्यम द्वारा विषयों तक पहुँच कर उनके आकार को ग्रहण करती है जिससे उस विषय का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। यदि मन इन्द्रियों के साथ युक्त न हो तो विषयों के बाह्य देश में स्थित होने पर भी उनका ज्ञान संभव नहीं होता। इसीलिये अनेक बार जब हम पुस्तक के अध्ययन में एकचित्त हो जाते हैं तब समीप से किसी के पुकारने पर भी उसकी आवाज हम नहीं सुन पाते। मन की एकाग्रता के ऐसे अनेक उदाहरण हैं।इस श्लोक में साधक को मन के द्वारा इन्द्रियों को संयमित करने की सम्मति दी गयी है। इसे सफलतापूर्वक तभी किया जा सकता है जब मन को एक श्रेष्ठ दिव्य लक्ष्य की ओर प्रेरित किया जाय। केवल हठपूर्वक मन के तीव्र वेग को रोकने का प्रयत्न करना जलप्लावित नदी का प्रवाह रोकने के प्रयत्न के समान है। इसका व्यर्थ होना निश्चित है। श्रीकृष्ण आत्मसंयम का उपाय आगे बतायेंगे।मन से इन्द्रियों का संयम करना साधना का निषेधात्मक पक्ष है। हम अपने सामान्य जीवन में अपनी अधिकांश शक्ति विषयों में ही व्यय करते हैं इसलिये संयम के द्वारा इस शक्ति का अपव्यय रोक कर उसे संग्रहित करने को कहा जाता है किन्तु यदि इस संग्रहित शक्ति का उपयोग तत्काल ही श्रेष्ठ वस्तु की प्राप्ति के लिये नहीं किया जाय तो संयम के बांध को तोड़कर वह वस्तु मनुष्य के सन्तुलित व्यक्तित्व को ही प्रवाह में बहाकर ले जायेगी। श्लोक की दूसरी पंक्ति में अपनी एकत्रित शक्ति का सदुपयोग करना सिखाया गया है।इस शक्ति का उपयोग कर्मेंन्द्रियों द्वारा कर्मक्षेत्र में समुचित रूप से कर्म करने में करना चाहिये। यहाँ भी एक महत्त्वपूर्ण सावधानी रखने के लिये श्रीकृष्ण कहते हैं। कर्मयोगी को सब कर्म अनासक्त होकर करने चाहिये।यदि किसी कैमरे में साधारण कागज रखकर किसी वस्तु का चित्र खींचने का प्रयत्न किया जाय तो कितनी ही देर प्रकाशित वस्तु के सामने रखने पर भी उस कागज पर कोई चित्रण नहीं हो सकता परन्तु कागज को कैमरे के उपयुक्त बनाने पर क्षणमात्र में चित्र खींचा जा सकता है। इसी प्रकार आसक्ति से भरे मन पर विषयों के सम्बन्ध से शीघ्र ही वासनायें अंकित हो जाती हैं। इसी कारण से भगवान् कहते हैं कि हमको अनासक्त होकर कर्म करना चाहिये जिससे नये संस्कार उत्पन्न नहीं होंगे। साथहीसाथ पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय भी हो जायेगा।गीता में इस सिद्धांत का विवेचन इतनी युक्तियुक्त एवं वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है कि उसका अध्ययन करने वाले किसी भी विद्यार्थी को उसमें दोष देखने अथवा संदेह करने का अवसर ही नहीं मिलता।इन्द्रिय संयम से शक्ति के अपव्यय को रोक कर अनासक्त भाव से कर्मेंद्रियों के द्वारा श्रेष्ठ कर्म करने में उसका सदुपयोग करने से चित्तशुद्धि होगी। इस प्रकार जो कर्मक्षेत्र हमारे बन्धन का कारण था उसी में गीता में वर्णित जीवन की शैली अपनाते हुये कर्म करने पर वही क्षेत्र मोक्ष का साधन बन जायेगा।इसलिये
English Translation By Swami Sivananda
But whosoever, controlling the senses by the mind, O Arjuna, engages himself in Karma Yoga with the organs of action, without attachment, he excels.
Transliteration
yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate'rjuna
karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyateअनुवाद
परन्तु हे अर्जुन! जो मनुष्य मन से इन्द्रियों को वश में करके, अनासक्त होकर कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण सच्चे कर्मयोगी की पहचान बताते हैं। जो व्यक्ति केवल बाहर से कर्मों का त्याग नहीं करता, बल्कि अपने मन से इन्द्रियों को नियंत्रित करता है और बिना किसी आसक्ति के अपने कर्तव्य निभाता है, वही श्रेष्ठ है। ऐसा व्यक्ति दिखावा नहीं करता, बल्कि अनासक्त भाव से समाज और ईश्वर के लिए कर्म करता है।
Translation
But, O Arjuna, he who, controlling the senses by the mind, engages in karma-yoga with the organs of action, without attachment, is superior.
Meaning
In this verse, Lord Krishna defines the true karma-yogi. A person who does not merely renounce actions externally, but controls their senses through the mind and performs their duties without attachment, is considered superior. Such a person avoids hypocrisy and acts selflessly for the greater good.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यः | जो |
| तु | परन्तु |
| इन्द्रियाणि | इन्द्रियों को |
| मनसा | मन से |
| नियम्य | नियंत्रित करके |
| आरभते | आचरण करता है |
| अर्जुन | हे अर्जुन |
| कर्मेन्द्रियैः | कर्मेन्द्रियों द्वारा |
| कर्मयोगम् | कर्मयोग का |
| असक्तः | अनासक्त (बिना आसक्ति के) |
| सः | वह |
| विशिष्यते | श्रेष्ठ है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yaḥ | who |
| tu | but |
| indriyāṇi | the senses |
| manasā | by the mind |
| niyamya | controlling |
| ārabhate | engages in |
| arjuna | O Arjuna |
| karmendriyaiḥ | by the organs of action |
| karmayogam | karma-yoga |
| asaktaḥ | unattached |
| saḥ | he |
| viśiṣyate | is superior |