श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.5

मूल श्लोक :

न हि कश्िचत्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता क्योंकि (प्रकृतिके) परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

प्रकृति के सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों के प्रभाव में मनुष्य सदैव रहता है। क्षणमात्र भी पूर्णरूप से निष्क्रिय होकर वह नहीं रह सकता। निष्क्रियता जड़ पदार्थ का धर्म है। शरीर से कोई कर्म न करने पर भी हम मन और बुद्धि से क्रियाशील रहते ही हैं। विचार क्रिया केवल निद्रावस्था में लीन हो जाती है। जब तक हम इन गुणों के प्रभाव में रहते हैं तब तक कर्म करने के लिए हम विवश होते हैं।इसलिए कर्म का सर्वथा त्याग करना प्रकृति के नियम के विरुद्ध होने के कारण असम्भव है। शारीरिक कर्म न करने पर भी मनुष्य व्यर्थ के विचारों में मन की शक्ति को गँवाता है। अत गीता का उपदेश है कि मनुष्य शरीर से तो कर्म करे परन्तु समर्पण की भावना से इससे शक्ति के अपव्यय से बचाव होने के साथसाथ उसके व्यक्तित्व का भी विकास होता है।आत्मस्वरूप को नहीं जानने वाले पुरुष के लिए कर्तव्य का त्याग उचित नहीं है।भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Verily none can ever remain for even a moment without performing action; for everyone is made to act helplessly indeed by the alities born of Nature.

Transliteration

na hi kaścit kṣaṇam api jātu tiṣṭhaty akarmakṛt
kāryate hy avaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijair guṇaiḥ

अनुवाद

क्योंकि कोई भी मनुष्य किसी भी काल में एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रहता; क्योंकि सभी मनुष्य प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों द्वारा विवश होकर कर्म करने के लिए बाध्य हैं।

भावार्थ

भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कोई भी प्राणी कभी भी पूर्ण रूप से कर्महीन नहीं हो सकता। मनुष्य का शरीर और मन निरंतर प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस और तमस) के प्रभाव में कार्य करते रहते हैं। इसलिए, कृत्रिम रूप से कर्मों का त्याग करने के बजाय, मनुष्य को अनासक्त भाव से अपने नियत कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

Translation

For no one ever remains even for a moment without doing action; because everyone is helplessly forced to perform action by the qualities born of material nature.

Meaning

Lord Krishna explains that absolute inaction is impossible for any embodied being. The physical and mental body is constantly driven by the three modes of material nature (Sattva, Rajas, and Tamas). Therefore, instead of artificially renouncing action, one should engage in righteous duties without attachment.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
नहीं
हिनिश्चय ही
कश्चित्कोई भी
क्षणम्एक क्षण
अपिभी
जातुकिसी भी समय
तिष्ठतिरहता है
अकर्मकृत्बिना कर्म किए
कार्यतेबाध्य किया जाता है
हिनिश्चय ही
अवशःविवश होकर
कर्मकर्म
सर्वःसब
प्रकृतिजैःप्रकृति से उत्पन्न
गुणैःगुणों द्वारा

Word by word

WordMeaning
nanot
hicertainly
kaścitanyone
kṣaṇama moment
apieven
jātuat any time
tiṣṭhatiremains
akarmakṛtwithout doing action
kāryateis forced to do
hicertainly
avaśaḥhelplessly
karmaaction
sarvaḥeveryone
prakṛtijaiḥborn of material nature
guṇaiḥby the modes