श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.41

मूल श्लोक :

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

इसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है श्रीकृष्ण बिना पर्याप्त तर्क दिये किसी सत्य का प्रतिपादन मात्र नहीं करते। अब वे यहाँ भी युक्तियुक्त विवेचन के पश्चात् इन्द्रियों को वश में करने का उपदेश देते हैं जिसके सम्पादन से अन्तकरण में स्थित कामना को नष्ट किया जा सकता है।इच्छा को यहाँ पापी कहने का कारण यह है कि वह अपने स्थूल रूप में हमें अत्यन्त निम्न स्तर के जीवन को जीने के लिए विवश कर देती है। धुएँ के समान सात्त्विक इच्छा होने पर भी हमारा शुद्ध अनन्तस्वरूप पूर्णरूप से प्रगट नहीं हो पाता। अत सभी प्रकार की इच्छाएँ कमअधिक मात्रा में पापयुक्त ही कही गयी हैं।चिकित्सक को किसी रोगी के लिए औषधि लिख देना सरल है परन्तु यदि वह औषधि आकाशपुष्प से बनायी जाती हो तो रोगी कभी स्वस्थ नहीं हो सकता इसी प्रकार गुरु का शिष्य को इन्द्रिय संयम का उपदेश देना तो सरल है परन्तु जब तक वे उसका कोई साधन नहीं बताते तब तक उनका उपदेश आकाश पुष्प से बनी औषधि के समान ही असम्भव समझा जायेगा।हम किस वस्तु का आश्रय लेकर इस इच्छा का त्याग करें  इस प्रश्न का उत्तर है

English Translation By Swami Sivananda

Therefore, O best of the Bharatas (Arjuna), controlling the senses first, do thou kill this sinful thing, the destroyer of knowledge and realisation.

Transliteration

tasmāttvamindriyāṇyādau niyamya bharatarṣabha
pāpmānaṃ prajahi hyenaṃ jñānavijñānanāśanam

अनुवाद

इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! तुम सबसे पहले इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस पापी को अवश्य मार डालो।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को काम (वासना) पर विजय प्राप्त करने का व्यावहारिक उपाय बताते हैं। चूँकि काम का वास इन्द्रियों, मन और बुद्धि में होता है, इसलिए सबसे पहले इन्द्रियों को वश में करना आवश्यक है। ऐसा करके मनुष्य ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस महान पापी शत्रु का वध कर सकता है।

Translation

Therefore, O best of the Bharatas, in the very beginning, having controlled the senses, certainly destroy this sinful destroyer of knowledge and realization.

Meaning

In this verse, Lord Krishna advises Arjuna on the practical step to conquer lust. Since lust first occupies the senses, mind, and intelligence, one must begin by regulating the senses. By doing so, one can destroy this sinful enemy that obscures both theoretical knowledge and practical realization.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तस्मात्इसलिए
त्वम्तुम
इन्द्रियाणिइन्द्रियों को
आदौसबसे पहले
नियम्यवश में करके
भरतर्षभहे भरतश्रेष्ठ
पाप्मानम्पापी को
प्रजहिमार डालो
हिनिश्चय ही
एनम्इस
ज्ञानज्ञान
विज्ञानऔर विज्ञान के
नाशनम्नाश करने वाले को

Word by word

WordMeaning
tasmāttherefore
tvamyou
indriyāṇithe senses
ādauin the beginning
niyamyahaving controlled
bharatarṣabhaO best of the Bharatas
pāpmānamthe sinful
prajahidestroy
hicertainly
enamthis
jñānaknowledge
vijñānaand realization
nāśanamthe destroyer