Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.4
मूल श्लोक :
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छतिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अपने आत्मस्वरूप की दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति परिपूर्ण है। इस पूर्णत्व के अज्ञान के कारण हमारी बुद्धि में अनेक इच्छायें सुख को पाने के लिये उत्पन्न होती हैं। यह सब जानते हैं कि हम केवल उन्हीं वस्तुओं की इच्छा करते हैं जो पहले से हमारे पास पूर्ण रूप में अथवा पर्याप्त मात्रा में नहीं होतीं। जैसी इच्छायें वैसी ही विचार वृत्तियाँ मन में उठती हैं। मन में उठने वाली ये वृत्तियाँ विक्षेप कहलाती हैं। प्रत्येक क्षण इन वृत्तियों के गुणधर्म इच्छाओं के अनुरूप ही होते हैं। ये विचार ही शरीर के स्तर पर बाह्य जगत् में मनुष्य के कर्म के रूप में व्यक्त होते हैं। इस प्रकार अविद्या जनित इच्छा विक्षेप और कर्म की श्रृंंखला में हम बँधे पड़े हुए हैं।इस पर और अधिक गहराई से विचार करने पर ज्ञात होगा कि वास्तव में यह सब भिन्नभिन्न न होकर एक आत्म अज्ञान के ही अनेक रूप हैं। यह अज्ञान बुद्धि मन और शरीर के स्तर पर क्रमश इच्छा विचार और कर्म के रूप में व्यक्त होता है। अत स्वाभाविक है कि यदि परम तत्त्व की परिभाषा अज्ञान के परे का अनुभव है तो यह भी सत्य है कि इच्छा शून्य या विचार शून्य या कर्म शून्य स्थिति ही आत्मस्वरूप है। कर्मशून्यत्व को यहाँ नैर्ष्कम्य कहा है।इस प्रकार विचार करने से ज्ञात होता है कि नैर्ष्कम्य का वास्तविक अर्थ पूर्णत्व है। अत भगवान् कहते हैं कि कर्मों के संन्यास मात्र से नैर्ष्कम्य सिद्धि नहीं मिलती। जीवनसंघर्षों से पलायन व्यक्ति के विकास के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग नहीं है। अर्जुन का विचार रणभूमि से पलायन करने का था और इसीलिए उसे वैदिक संस्कृति के सम्यक् ज्ञान की पुन शिक्षा देना आवश्यक था। भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा दिव्य गीतोपदेश का यही प्रयोजन भी था।कर्मयोग से अन्तकरण शुद्धि और तत्पश्चात् ज्ञानयोग से आत्मानुभूति संक्षेप में यह है आत्मविकास की साधना जिसका संकेत इस श्लोक में किया गया है। इसलिए हिन्दू धर्म पर लिखने वाले सभी महान् लेखक इस श्लोक को प्राय उद्धृत करते हैं।ज्ञान के बिना केवल कर्मसंन्यास से ही नैर्ष्कम्य अथवा पूर्णत्व क्यों नहीं प्राप्त होता कारण यह है कि
English Translation By Swami Sivananda
Not by non-performance of actions does man reach actionlessness; nor by mere renunciation does he attain to perfection.
Transliteration
na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṃ puruṣo'śnute
na ca saṃnyasanādeva siddhiṃ samadhigacchatiअनुवाद
मनुष्य कर्मों को आरम्भ न करने से नैष्कर्म्य (कर्मों से मुक्ति) को प्राप्त नहीं होता, और न ही केवल संन्यास (कर्मों के त्याग) से सिद्धि प्राप्त करता है।
भावार्थ
भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि केवल कर्मों को न करने से कोई व्यक्ति कर्म-बंधन से मुक्त नहीं हो सकता। सच्ची मुक्ति या सिद्धि केवल कर्मों के बाहरी त्याग (संन्यास) से नहीं मिलती। मनुष्य को अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हुए कर्मफल के प्रति आसक्ति का त्याग करना चाहिए।
Translation
A person does not attain freedom from action by the non-commencement of actions; nor does he attain perfection merely by renunciation.
Meaning
Lord Krishna explains that simply avoiding work does not lead to spiritual perfection or freedom from karmic reactions. True renunciation is not the physical abandonment of duties, but the detachment from the fruits of action. Therefore, one cannot achieve the ultimate goal of life merely by giving up prescribed duties.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| कर्मणाम् | कर्मों के |
| अनारम्भात् | आरम्भ न करने से |
| नैष्कर्म्यम् | कर्म-मुक्ति को |
| पुरुषः | मनुष्य |
| अश्नुते | प्राप्त करता है |
| न | नहीं |
| च | और |
| संन्यसनात् | संन्यास से |
| एव | केवल |
| सिद्धिम् | सिद्धि को |
| समधिगच्छति | प्राप्त करता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| karmaṇām | of actions |
| anārambhāt | from non-commencement |
| naiṣkarmyam | freedom from action |
| puruṣaḥ | a person |
| aśnute | attains |
| na | not |
| ca | and |
| saṃnyasanāt | from renunciation |
| eva | only |
| siddhim | perfection |
| samadhigacchati | attains |