Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.37
मूल श्लोक :
श्री भगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रीभगवान् बोले रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यह काम यह क्रोध काम अर्थात् इच्छा ही मनुष्य के ह्रदय में स्थित राक्षस है। आत्म अज्ञान ही बुद्धि में इच्छा रूप में व्यक्त होता है। इस श्लोक में काम और क्रोध इन दोनों को भिन्न नहीं समझना चाहिये। किसी परिस्थिति विशेष में काम ही क्रोध का रूप ले लेता है। मन का वह विक्षेप जो किसी वस्तु को प्राप्त करने की अत्यन्त अधीरता के रूप में व्यक्त होता है काम कहलाता है। सामान्यत इच्छा अपने से भिन्न किसी अप्राप्त वस्तु के लिये ही होती हैं। जगत् में असंख्य व्यक्तियों और परिस्थितियों के मध्य सदैव इच्छा का पूर्ण होना सम्भव नहीं होता और इस प्रकार हमारे और इच्छित वस्तु के बीच कोई विघ्न आता है तो प्रतिहत इच्छा ही क्रोध का रूप ले लेती है।इस प्रकार काम अथवा क्रोध ही वह राक्षस है जो हमें परिस्थितियों के साथ समझौता करने को विवश कर देता है। आदर्शों को भुलाकर हमें पापाचरण में प्रवृत्त करता है। हमारी निम्न कोटि की इच्छायें जितनी प्रबल होगी उतना ही पापपूर्णं हमारा जीवन होगा। कामनाएं हमारे विवेक को आच्छादित कर देती हैं। काम के उत्पन्न होने पर उससे ही असंख्य प्रकार की दुखदायक वृत्तियां उत्पन्न होती हैं। इन सब के वश में होना अज्ञान और उनके ऊपर शासन करना ज्ञान है।अब भगवान् दृष्टांतों के द्वारा समझाते हैं कि किस प्रकार हमारा शत्रु यह काम हमारे विवेक को आच्छादित करता है
English Translation By Swami Sivananda
The Blessed Lord said It is desire, it is anger both of the ality of Rajas, all-devouring, all-sinful; know this as the foe here (in this world).
Transliteration
śrī bhagavānuvāca
kāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ
mahāśano mahāpāpmā viddhyenamiha vairiṇamअनुवाद
श्री भगवान ने कहा — यह काम है, यह क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न हुआ है। यह बहुत खाने वाला (अत्यंत भोगी) और महापापी है, इसे ही तुम इस संसार में वैरी (शत्रु) जानो।
भावार्थ
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि मनुष्य का वास्तविक शत्रु काम (वासना) है। जब यह काम अतृप्त रहता है, तो यह क्रोध का रूप धारण कर लेता है। रजोगुण से उत्पन्न यह काम कभी न तृप्त होने वाला और महान पापों का कारण है, इसलिए आध्यात्मिक मार्ग में इसे ही सबसे बड़ा शत्रु समझना चाहिए।
Translation
The Supreme Lord said: It is lust, it is anger, born of the mode of passion. All-devouring and greatly sinful, know this to be the enemy here (in this world).
Meaning
Lord Krishna explains to Arjuna that the true enemy of a living entity is lust, which transforms into anger when unfulfilled. Born from the mode of passion, this lust is insatiable and compels one to commit great sins. Therefore, a spiritual seeker must recognize it as the ultimate destructive force and the greatest enemy in this world.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्री भगवान् | श्री भगवान |
| उवाच | ने कहा |
| कामः | काम (वासना) |
| एषः | यह |
| क्रोधः | क्रोध |
| एषः | यह |
| रजोगुणसमुद्भवः | रजोगुण से उत्पन्न |
| महाशनः | बहुत खाने वाला (अतृप्त) |
| महापाप्मा | महान पापी |
| विद्धि | जानो |
| एनम् | इसको |
| इह | इस संसार में |
| वैरिणम् | शत्रु |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrī bhagavān | the Supreme Lord |
| uvāca | said |
| kāmaḥ | lust |
| eṣaḥ | this |
| krodhaḥ | anger |
| eṣaḥ | this |
| rajoguṇasamudbhavaḥ | born of the mode of passion |
| mahāśanaḥ | all-devouring |
| mahāpāpmā | greatly sinful |
| viddhi | know |
| enam | this |
| iha | in this world |
| vairiṇam | the enemy |