Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.36
मूल श्लोक :
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
अर्जुन बोले हे वार्ष्णेय् फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुएकी तरह किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
धर्मशास्त्रों की परम्परा के अनुसार यहाँ अर्जुन विचाराधीन प्रकरण पर एक निश्चित प्रश्न पूछता है। इस प्रश्न से ही ज्ञात होता है कि अर्जुन अपनी प्रारम्भिक उन्माद् की स्थिति से बहुत कुछ बाहर आ गया था और अब उसने आत्मनिरीक्षण भी प्रारम्भ कर दिया था जिसके फलस्वरूप उसे अपने ही मन में कुछ ऐसे गुण अथवा शक्तियाँ कार्य कर रहीं अनुभव हुईं जो उसके उच्च गुणों की अभिव्यक्ति में बाधक बनकर उनके प्रभाव को ही नष्ट कर रहीं थीं। उसका प्रश्न ऐसे परिचित शब्दों में पूछा गया है कि लगता है मानो आज का कोई विद्यार्थी ही इस प्रश्न को पूछ रहा है।कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जिसे कुछ मात्रा में ही सही अच्छे और बुरे का पुण्य और पाप का ज्ञान न हो। बुद्धि से प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि पुण्य क्या है किन्तु जब कर्म करने का समय आता है तब पाप में ही उसकी प्रवृत्ति होती है। यह एक दुर्भाग्य पूर्ण विडम्बना है। स्वयं के आदर्श और वास्तविक आचरण में जो दूरी रहती है वह सभी आत्मनिरीक्षक विचारकों के लिये वास्तव में एक बड़ी समस्या बन जाती है।हमारे हृदय मे स्थित दैवी गुण व्यक्त होकर श्रेष्ठतर उपलब्धि प्राप्त करना चाहते हैं परन्तु पाशविक प्रवृत्तियां हमें प्रलोभित करके श्रेयमार्ग से दूर ले जाती हैं और हम निम्न स्तर के शारीरिक सुखों में ही रमण करते रहते हैं। अधिकांश समय यह सब हमारी अनिच्छा से ही होता रहता है। अर्जुन पूछता है मन में बैठे इस राक्षस का स्वरूप क्या है जो हममें स्थित दैवी गुणों को सुनियोजित ढंग से लूट ले जाता है वृष्णि वंश में जन्म होने से श्रीकृष्ण का नाम वार्ष्णेय था। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए
English Translation By Swami Sivananda
Arjuna said But impelled by what does man commit sin, though against his wishes, O Varshneya (Krishna), constrained as it were, by force?
Transliteration
arjuna uvāca
atha kena prayukto 'yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ
anicchann api vārṣṇeya balād iva niyojitaḥअनुवाद
अर्जुन ने कहा — हे वृष्णिवंशी (कृष्ण)! तो फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी, मानो बलपूर्वक लगाया गया हो, किसके द्वारा प्रेरित होकर पाप करता है?
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से मानव स्वभाव की एक गहरी दुविधा के बारे में पूछते हैं। वह जानना चाहते हैं कि मनुष्य यह जानते हुए भी कि पाप गलत है, क्यों उसे करने के लिए विवश हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई बाहरी शक्ति उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक पाप कर्मों में धकेल रही हो।
Translation
Arjuna said: O descendant of Vrishni (Krishna), by what is this man impelled to commit sin, even unwillingly, as if engaged by force?
Meaning
In this verse, Arjuna asks Lord Krishna about a profound dilemma of human nature. He wants to know what forces a person to commit sinful acts, even when they know it is wrong and do not wish to do so. It appears as though some external force is compelling the individual to act against their own free will.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन |
| उवाच | ने कहा |
| अथ | तो फिर |
| केन | किसके द्वारा |
| प्रयुक्तः | प्रेरित होकर |
| अयम् | यह |
| पापम् | पाप |
| चरति | करता है |
| पूरुषः | मनुष्य |
| अनिच्छन् | न चाहता हुआ |
| अपि | भी |
| वार्ष्णेय | हे वृष्णिवंशी (कृष्ण) |
| बलात् | बलपूर्वक |
| इव | मानो |
| नियोजितः | लगाया गया |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| arjunaḥ | Arjuna |
| uvāca | said |
| atha | then |
| kena | by what |
| prayuktaḥ | impelled |
| ayam | this |
| pāpam | sin |
| carati | commits |
| pūruṣaḥ | man |
| anicchan | not wishing |
| api | even |
| vārṣṇeya | O descendant of Vrishni |
| balāt | by force |
| iva | as if |
| niyojitaḥ | engaged |