Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.35
मूल श्लोक :
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
धर्म शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है। धार्मिकता सद्व्यवहार कर्तव्य सद्गुण आदि विभिन्न अर्थों में इसका प्रयोग किया गया है। धर्म की परिभाषा हम देख चुके हैं कि जिसके कारण वस्तु का अस्तित्व सिद्ध होता है वह उस वस्तु का धर्म कहलाता है।एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति का भिन्नत्व उसके विचारों द्वारा निश्चित किया जाता है। इन विचारों का स्तर गुण दिशा आदि व्यक्ति की वासनाओं पर निर्भर करते हैं। यही है मनुष्य का स्वभाव अथवा धर्म। अत मनसंयम के इस प्रकरण में धर्म से तात्पर्य प्रत्येक व्यक्ति की वासनाओं से है।स्वधर्म और परधर्म यहाँ स्वधर्म का अर्थ किसी जाति विशेष में जन्म लेने पर प्राप्त होने वाले कर्तव्य से नहीं है। स्वधर्म का सही तात्पर्य है स्वयं की वासनायें। स्वयं की सहज और स्वाभाविक वासनाओं के अनुसार कार्य करने से ही जीवन में शांति और आनन्द सफलता और सन्तोष का अनुभव होता है। अत परधर्म का अर्थ है दूसरे के स्वभाव के अनुसार व्यवहार और कर्म करना जो भयावह होता है इसमें दो मत नहीं हो सकते।गीता में अर्जुन के स्वभाव को देखते हुये भगवान् उसे युद्ध करने का स्पष्ट उपदेश देते हैं। जन्मजात राजकुमार अर्जुन ने अपने विद्यार्थी जीवन में ही साहस और शूरवीरता का प्रदर्शन किया था और धनुर्विद्या में निपुणता भी प्राप्त की थी। अत युद्ध जैसा खतरनाक कर्म उसके स्वभाव के अनुकूल ही था। प्रथम अध्याय से यह स्पष्ट हो जाता है कि अर्जुन ने संभवत अपने प्रारम्भिक शिक्षणकाल में यह सुना और समझा था कि संन्यास और त्याग का अर्थात् ब्राह्मण का जीवन उसके जीवन से श्रेष्ठतर है। इसीलिये युद्धभूमि पलायन से गुफाओं में बैठकर ध्यानाभ्यास करने की उसकी इच्छा हो रही थी। श्रीकृष्ण उसे स्मरण दिलाते हैं कि स्वधर्म पालन में कुछ कमी रहने पर भी उसी का पालन उसके आत्मविकास के लिये श्रेयष्कर है। दूसरे व्यक्ति के श्रेष्ठ और दिव्य जीवन की अनुकृति मात्र से अर्जुन को लाभ नहीं होगा।यद्यपि समस्त अनर्थों का मूल कारण पहले बताया जा चुका है तथापि उसके और अधिक स्पष्टीकरण के लिए
English Translation By Swami Sivananda
Better is one's own duty, though devoid of merit than the duty of another well discharged. Better is death in one's own duty; the duty of another is fraught with fear (is productive of danger).
Transliteration
śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt
svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥअनुवाद
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से, गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है, परन्तु दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करने की प्रेरणा दे रहे हैं। वे समझाते हैं कि किसी अन्य के धर्म का पूर्णता से पालन करने की अपेक्षा अपना धर्म त्रुटिपूर्ण ढंग से करना भी अधिक श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव और कर्तव्य के मार्ग पर चलते हुए मृत्यु प्राप्त करना भी कल्याणकारी है, जबकि दूसरों के मार्ग का अनुसरण करना हमेशा भय और पतन का कारण बनता है।
Translation
One’s own duty, though devoid of merit, is better than the duty of another well performed. Death in one’s own duty is better; the duty of another is fraught with fear.
Meaning
In this verse, Lord Krishna motivates Arjuna to follow his own duty as a warrior. He explains that it is far better to perform one’s own prescribed duty, even if imperfectly, than to perfectly execute the duty of another. Meeting death while engaged in one’s own natural duty brings spiritual benefit, whereas following another’s path is dangerous and leads to fear.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रेयान् | श्रेष्ठ |
| स्वधर्मः | अपना धर्म |
| विगुणः | गुणरहित |
| परधर्मात् | दूसरे के धर्म से |
| स्वनुष्ठितात् | अच्छी तरह से पालन किए गए |
| स्वधर्मे | अपने धर्म में |
| निधनम् | मृत्यु |
| श्रेयः | कल्याणकारी |
| परधर्मः | दूसरे का धर्म |
| भयावहः | भय उत्पन्न करने वाला |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śreyān | better |
| svadharmaḥ | one’s own duty |
| viguṇaḥ | devoid of merit |
| paradharmāt | than another’s duty |
| svanuṣṭhitāt | well performed |
| svadharme | in one’s own duty |
| nidhanam | death |
| śreyaḥ | better |
| paradharmaḥ | another’s duty |
| bhayāvahaḥ | fraught with fear |