Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.34
मूल श्लोक :
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौHindi Translation By Swami Ramsukhdas
इन्द्रियइन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमे विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्व श्लोक में कहा गया था कि शास्त्राध्ययन करने वाला ज्ञानवान् पुरुष भी नैतिकता का उच्च जीवन जीने में अपने को असमर्थ पाता है क्योंकि उसकी कुछ निम्न स्तर की प्रवृत्तियाँ कभीकभी उससे अधिक शक्तिशाली सिद्ध होती हैं। सर्वत्र अनुपलब्ध औषधि का उपचार लिख देना रोग का निवारण करना नहीं कहलाता। दार्शनिक तत्त्ववेत्ता का यह कर्तव्य है कि वह केवल हमारे वर्तमान जीवन की दुर्बलताओं को ही नहीं दर्शाये बल्कि पूर्णत्व की स्थिति का ज्ञान कराकर उस साधन मार्ग को भी दिखाये जिससे हम दोषमुक्त होकर पूर्णस्वरूप में स्थित हो सकें। केवल ऐसा करके ही वह दार्शनिक तत्त्वविज्ञ पुरुष अपनी पीढ़ी को कृतार्थ कर सकता है।यह सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभावानुसार कार्य करता है परन्तु यह स्वभाव वह अपने कर्म एवं विचारों के द्वारा बनाता है और न कि किसी अन्य के कारण। अत यहाँ पुरुषार्थ के लिये अवसर है। उसी को यहाँ श्रीकृष्ण बता रहे हैं। प्रत्येक इन्द्रिय के विषय के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के मन में राग अथवा द्वेष उत्पन्न होता है। शब्दस्पर्शादि इन्द्रियों के विषय स्वयं किसी भी प्रकार हमारे अन्तकरण में दुख या विक्षेप उत्पन्न नहीं कर सकते। विषयों के ग्रहण करके मन किसी के प्रति राग और किसी के प्रति द्वेष रखता है और मन के इन रागद्वेषों के कारण प्रिय या अप्रिय विषय के दर्शन अथवा प्राप्ति से मनुष्य को हर्ष या विषाद होता है। स्वयं रागद्वेष्ा को उत्पन्न करके मनुष्य का फिर प्रयत्न होता है प्रिय की प्राप्ति और अप्रिय का त्याग। विषयों के प्रति राग और द्वेष सदा परिवर्तित होते रहने के कारण वह सदा ही क्षुब्धचित्त बना रहता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये रागद्वेष ही लुटेरे हैं जो मन की शांति का हरण कर लेते हैं और जिनके कारण मनुष्य सच्चा जीवन नहीं जी पाता। वास्तव में यह दुख की बात है।वस्तुस्थिति को दर्शाकर भगवान् समस्त साधकों को उपदेश देते हैं कि मनुष्य को चाहिये कि वह इन दोनों के वश में न होवे।प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में बाह्य जगत् से पलायन करने का उपदेश गीता में कहीं पर भी नहीं मिलता। भगवान् का उपदेश तो यहाँ और अभी जीवन की उपलब्ध परिस्थितियों में शरीर मन और बुद्धि के माध्यम से सब अनुभवों को प्राप्त करते हुये जीने के लिये है। आग्रह केवल इस बात का है कि सभी परिस्थितियों में मनुष्य को मन आदि उपाधियों का स्वामी बनकर रहना चाहिये और न कि उनका दास बनकर। इस प्रकार के स्वामित्व को प्राप्त करने का उपाय राग और द्वेष से मुक्त हो जाना है।रागद्वेष से मुक्ति पाने के लिये मिथ्या अहंकार तथा तज्जनित अन्य प्रवृत्तियों को समाप्त करना चाहिये क्योंकि राग और द्वेष अहंकार से सम्बन्धित हैं। इसलिए अहंकाररहित कर्म करने पर वासनाओं का क्षय हो जाता है। वासनाओं से उत्पन्न होता है मन और वहीं पर अहंकार का खेल होता है। जैसेजैसे वासनायें क्षीण होती जाती हैं वैसेवैसे मन भी नष्ट हो जाता है। मन के नष्ट होने पर शुद्ध आत्मा का प्रतिबिम्ब रूप अहंकार भी नष्ट हो जाता है।भगवान् वासना क्षय का उपाय निम्न श्लोक में बताते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Attachment and aversion for the objects of the senses abide in the senses; let none come under their sway; for, they are his foes.
Transliteration
indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau
tayorna vaśamāgacchettau hyasya paripanthinauअनुवाद
प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष स्थित हैं। मनुष्य को इन दोनों के वश में नहीं आना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही इसके शत्रु हैं।
भावार्थ
प्रत्येक इन्द्रिय का अपने विषयों के प्रति स्वाभाविक आकर्षण (राग) या विकर्षण (द्वेष) होता है। परन्तु साधक को इन दोनों के अधीन नहीं होना चाहिए। भगवान कृष्ण अर्जुन को सचेत करते हैं कि राग और द्वेष आध्यात्मिक मार्ग के दो बड़े शत्रु हैं, जो मनुष्य को उसके कल्याण के मार्ग से भटका देते हैं।
Translation
Attachment and aversion are situated in the object of every sense. One should not come under the control of these two, for they are certainly his enemies.
Meaning
Every sense naturally experiences attachment to pleasant objects and aversion to unpleasant ones. However, a seeker must not be controlled by these dualities. Krishna warns Arjuna that attachment and aversion are the two great enemies on the spiritual path, obstructing one’s progress toward self-realization.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| इन्द्रियस्य | इन्द्रिय के |
| इन्द्रियस्य | प्रत्येक इन्द्रिय के |
| अर्थे | विषय में |
| रागद्वेषौ | राग और द्वेष |
| व्यवस्थितौ | स्थित हैं |
| तयोः | उन दोनों के |
| न | नहीं |
| वशम् | अधीन |
| आगच्छेत् | आना चाहिए |
| तौ | वे दोनों |
| हि | निश्चय ही |
| अस्य | इस (मनुष्य) के |
| परिपन्थिनौ | शत्रु हैं |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| indriyasya | of the sense |
| indriyasya | of the sense |
| arthe | in the object |
| rāgadveṣau | attachment and aversion |
| vyavasthitau | situated |
| tayoḥ | of them both |
| na | not |
| vaśam | control |
| āgacchet | one should come |
| tau | those two |
| hi | certainly |
| asya | his |
| paripanthinau | enemies |