श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.32

मूल श्लोक :

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोषदृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् के उपदेश में दोष देखकर उसका पालन न करने से मनुष्य और भी अधिक मोहित हुआ अपनी ही हानि कर लेगा।जीवन के मार्ग को भली प्रकार समझ लेने पर ही मनुष्य को कर्ममय जीवन जीने के लिये उत्साहित किया जा सकता है। यदि मनुष्य पहले से किसी सिद्धांत की ही निन्दा में प्रवृत्त हो जाता है तो उस सिद्धांत के अनुरूप जीवन यापन की कोई सम्भावना ही नहीं रह जाती। कर्मयोग जीवन यापन का एक मार्ग है और उसके कल्याणकारी फल को प्राप्त करने के लिये हमें तदनुसार ही जीवन जीना होगा।अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर कर्म करना ही आदर्श जीवन है जिसके द्वारा मनुष्य को नित्य और महान् उपलब्धियां प्राप्त हो सकती हैं। ऐसे जीवन का त्याग करने का अर्थ है अविवेक को निमन्त्रण देना और अन्त में स्वयं का नाश कराना।बुद्धि के कारण ही मनुष्य को प्राणि जगत् में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। बुद्धि में स्थित आत्मानात्मविवेक सत्य और मिथ्या का विवेक करने की क्षमता का सदुपयोग ही आत्मविकास का एकमात्र उपाय है। विवेक के नष्ट होने पर वह पशु के समान मन की प्रवृत्तियों के अनुसार व्यवहार करने लगता है तथा मनुष्य जीवन के परम पुरुषार्थ को प्राप्त नहीं कर पाता। यही उसका विनाश है।क्या कारण है कि लोग इस उपदेशानुसार कर्तव्य पालन नहीं करते  भगवान् के उपदेश का उल्लंघन करने में उन्हें भय क्यों नहीं लगता  इसका उत्तर है

English Translation By Swami Sivananda

But those who carp at My teaching and do not practise it, deluded of all knowledge, and devoid of discrimination, know them to be doomed to destruction.

Transliteration

ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam
sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ

अनुवाद

परन्तु जो लोग ईर्ष्यावश मेरे इस मत का पालन नहीं करते हैं, उन अविवेकी लोगों को तुम सम्पूर्ण ज्ञानों में भ्रमित और नष्ट हुआ ही जानो।

भावार्थ

श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि जो लोग ईर्ष्या या अहंकार के कारण उनके उपदेशों को नकारते हैं, उनका क्या परिणाम होता है। ऐसे व्यक्ति पूरी तरह से भ्रमित हो जाते हैं और अपना सारा सच्चा ज्ञान तथा विवेक खो बैठते हैं। अंततः, परम सत्य से दूर हो जाने के कारण उनका आध्यात्मिक पतन हो जाता है।

Translation

But those who, out of envy, do not follow this teaching of mine, know them to be completely bewildered in all knowledge, ruined, and devoid of discrimination.

Meaning

Krishna warns about the consequences of rejecting His teachings out of envy or arrogance. Such individuals become completely deluded, losing all true knowledge and discrimination. Ultimately, their spiritual progress is ruined because they disconnect themselves from the supreme truth.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
येजो
तुपरन्तु
एतत्इस
अभ्यसूयन्तःदोष निकालते हुए (ईर्ष्या करते हुए)
नहीं
अनुतिष्ठन्तिपालन करते हैं
मेमेरे
मतम्मत का (उपदेश का)
सर्वज्ञानविमूढान्सम्पूर्ण ज्ञानों में भ्रमित
तान्उनको
विद्धिजानो
नष्टान्नष्ट हुए
अचेतसःअविवेकी

Word by word

WordMeaning
yethose who
tubut
etatthis
abhyasūyantaḥout of envy
nanot
anutiṣṭhantifollow
memy
matamteaching
sarvajñānavimūḍhānbewildered in all knowledge
tānthem
viddhiknow
naṣṭānruined
acetasaḥdevoid of discrimination