श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.31

मूल श्लोक :

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं वे भी सम्पूर्ण कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

कर्मयोग के सिद्धान्त का मात्र ज्ञान होने से नहीं किन्तु उसके अनुसार आचरण करने पर ही वह हमारा कल्याण कर सकेगा। यह श्रीकृष्ण का मत है। अध्यात्म ज्ञान तो एक ही है परन्तु आचार्यों सम्प्रदाय संस्थापकों एवं भिन्नभिन्न धर्म प्रथाओं के मतों में अनेक भेद हैं जिसका कारण यह है कि वे सभी तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपनी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करना चाहते थे जिससे सभी साधक परम पुरुषार्थ को प्राप्त कर सकें।बैलगाड़ी हांकने वाले चालक के चाबुक के नीचे काम करने वाले पशु के समान ही मनुष्य को बोझ उठाते हुये जीवन नहीं जीना चाहिये। परिश्रम केवल शरीर को सुदृढ़ बनाता है कर्म हमारे चरित्र की वक्रता को दूर कर आन्तरिक व्यक्तित्व को आभा प्रदान करते हैं। यदि हम अपने परिश्रमपूर्वक किये गये कर्मों में अपने मन और मस्तिष्क का भी पूर्ण उपयोग करें। असूया (गुणों में दोष दर्शन) का त्याग करके एवं श्रद्धापूर्वक कर्मयोग का पालन करने से ही यह संभव हो सकेगा।श्रद्धा  संस्कृत में श्रद्धा का भाव गम्भीर है जिसे अंग्रेजी भाषा के किसी एक शब्द द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता।श्रीशंकराचार्य श्रद्धा को पारिभाषित करते हुए कहते हैं कि शास्त्र और गुरु के वाक्यों में वह विश्वास जिसके द्वारा सत्य का ज्ञान होता है श्रद्धा कहलाता है।यहाँ किसी प्रकार के अन्धविश्वास को श्रद्धा नहीं कहा गया है वरन् उसे बुद्धि की वह सार्मथ्य बताया गया है जिससे सत्य का ज्ञान होता है। बिना विश्वास के किसी कार्य में प्रवृत्ति नहीं होती तथा विचारों की परिपक्वता के बिना विश्वास में दृढ़ता नहीं आती है।अनसूयन्त (गुणों में दोष को नहीं देखने वाले)  सामान्यत जगत् में हम जो कुछ ज्ञान प्राप्त करते हैं उसे समझने के लिये उसकी आलोचना भी की जाती है उसके विरुद्ध तर्क दिये जाते हैं। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुन को सावधान करते हैं कि केवल उग्र वादविवाद अथवा गहन अध्ययन मात्र में ही इस ज्ञान का उपयोग नहीं है। वास्तविक जीवन में उतारने से ही इस ज्ञान की सत्यता का अनुभव किया जा सकता है।वे भी कर्म से मुक्त होते हैं  ऐसे वाक्यों को पढ़कर अनेक विद्यार्थी स्तब्ध रह जाते हैं। अब तक भगवान् कुशलतापूर्वक कर्म करने का उपदेश दे रहे थे और अब अचानक कहते हैं कि वे भी कर्म से मुक्त हो जाते हैं। स्वाभाविक है कि जो पुरुष शास्त्रीय शब्दों के अर्थों को नहीं जानता उसे इन वाक्यों में विरोधाभास दिखाई देता है।नैर्ष्कम्य शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते समय हमने देखा कि आत्मअज्ञान ही इच्छा विचार और कर्म के रूप में व्यक्त होता है। अत आनन्दस्वरूप आत्मा को पहचानने पर अविद्याजनित इच्छायें और कर्मों का अभाव हो जाता है। इसलिये यहाँ बताई हुई कर्मों से मुक्ति का वास्तविक तात्पर्य है  अज्ञान के परे स्थित आत्मस्वरूप की प्राप्ति।केवल कर्मों के द्वारा परमात्मस्वरूप में स्थिति नहीं प्राप्त की जा सकती। संसदमार्ग स्वयं संसद नहीं है किन्तु वहाँ तक पहुँचने पर संसद भवन दूर नहीं रह जाता। इसी प्रकार यहाँ कर्मयोग को ही परमार्थ प्राप्ति का मार्ग कहकर उसकी प्रशंसा की गई है क्योंकि उसके पालन से अन्तकरण शुद्ध होकर साधक नित्यमुक्त स्वरूप का ध्यान करने योग्य बन जाता है।परन्तु इसके विपरीत

English Translation By Swami Sivananda

Those men who constantly practise this teaching of Mine with faith and without cavilling, they too are freed from actions.

Transliteration

ye me matam idaṃ nityam anutiṣṭhanti mānavāḥ
śraddhāvanto 'nasūyanto mucyante te 'pi karmabhiḥ

अनुवाद

जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोष-दृष्टि से रहित होकर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपने उपदेशों के पालन का फल बताते हैं। जो व्यक्ति बिना किसी ईर्ष्या या संदेह के, पूरी श्रद्धा के साथ निष्काम कर्मयोग के इस सिद्धांत का पालन करता है, वह कर्म बंधनों से मुक्त हो जाता है। यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक प्रगति के लिए भगवान के वचनों में अटूट विश्वास और दोष-दृष्टि का अभाव अत्यंत आवश्यक है।

Translation

Those human beings who, full of faith and free from envy, constantly follow this teaching of mine, they too are freed from the bondage of actions.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the reward of following His teachings. A person who practices this principle of selfless action (Karma Yoga) with full faith and without finding fault is liberated from the bondage of karma. This highlights that unwavering faith and an uncritical, envy-free attitude towards the divine instructions are essential for spiritual progress.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
येजो
मेमेरे
मतम्मत का
इदम्इस
नित्यम्सदा
अनुतिष्ठन्तिपालन करते हैं
मानवाःमनुष्य
श्रद्धावन्तःश्रद्धायुक्त होकर
अनसूयन्तःदोष-दृष्टि से रहित होकर
मुच्यन्तेमुक्त हो जाते हैं
तेवे
अपिभी
कर्मभिःकर्मों के बन्धन से

Word by word

WordMeaning
yethose who
memy
matamteaching
idamthis
nityamconstantly
anutiṣṭhantifollow
mānavāḥhuman beings
śraddhāvantaḥfull of faith
anasūyantaḥwithout envy
mucyanteare freed
tethey
apialso
karmabhiḥfrom the bondage of actions