Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.3
मूल श्लोक :
श्री भगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रीभगवान् बोले हे निष्पाप अर्जुन इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमें ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे होती है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
कर्मयोग और ज्ञानयोग को परस्पर प्रतिद्वन्द्वी मानने का अर्थ है उनमें से किसी एक को भी नहीं समझना। परस्पर पूरक होने के कारण उनका क्रम से अर्थात् एक के पश्चात् दूसरे का आश्रय लेना पड़ता है। प्रथम निष्काम भाव से कर्म करने पर मन में स्थित अनेक वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं। इस प्रकार मन के निर्मल होने पर उसमें एकाग्रता और स्थिरता आती है जिससे वह ध्यान में निमग्न होकर परमार्थ तत्त्व का साक्षात् अनुभव करता है।विदेशी संस्कृति के लोग हिन्दू धर्म को समझने में बड़ी कठिनाई का अनुभव करते हैं। साधनों की विविधता और परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले उपदेशों को पढ़कर उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है। परन्तु केवल इसी कारण से हिन्दू धर्म को अवैज्ञानिक कहने में उतनी ही बड़ी और हास्यास्पद त्रुटि होगी जितनी चिकित्साशास्त्र को विज्ञान न मानने में केवल इसीलिए कि एक ही चिकित्सक एक ही दिन में विभिन्न रोगियों को विभिन्न औषधियों द्वारा उपचार बताता है।अध्यात्म साधना करने के योग्य साधकों में दो प्रकार के लोग होते हैं क्रियाशील और मननशील। इन दोनों प्रकार के लोगों के स्वभाव में इतना अन्तर होता है कि दोनों के लिये एक ही साधना बताने का अर्थ होगा किसी एक विभाग के लोगों को निरुत्साहित करना और उनकी उपेक्षा करना। गीता केवल हिन्दुओं के लिये ही नहीं वरन् समस्त मानव जाति के कल्याणार्थ लिखा हुआ शास्त्र है। अत सभी के उपयोगार्थ उनकी मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं के अनुरूप दोनों ही वर्गों के लिये साधनायें बताना आवश्यक है।अत भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि क्रियाशील स्वभाव के मनुष्य के लिये कर्मयोग तथा मननशील साधकों के लिये ज्ञानयोग का उपदेश किया गया है। पुरा शब्द से वह यह इंगित करते है कि ये दो मार्ग सृष्टि के आदिकाल से ही जगत् में विद्यमान हैं।इस श्लोक में प्रथम बार भगवान् श्रीकृष्ण अपने वास्तविक परिचय की एक झलकमात्र दिखाते हैं। यदि गीतोपदेश देवकीपुत्र कृष्ण नामक किसी र्मत्य पुरुष का ही दिया होता तो अधिक से अधिक उसमें उस व्यक्ति की बुद्धि द्वारा समझे हुए सिद्धांत ही होते जिनका आधार जीवन के उसके स्वानुभव मात्र होते। जीवन में अनुभव किये तथ्यों में परिवर्तित होते रहने का विशेष गुण होता है और इसीलिये जब वे बदलते हैं तो हमारा पूर्व का निष्कर्ष भी परिवर्तित हो जाता है। परिवर्तित सामाजिक राजनैतिक आर्थिक परिस्थितियों एवं विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति के साथ समाजशास्त्र अर्थशास्त्र एवं विज्ञान के अगणित पूर्वप्रतिपादित सिद्धांत कालबाह्य हो चुके हैं। यदि गीता में कृष्ण नामक किसी मनुष्य की बुद्धि से पहुँचे हुए निष्कर्ष मात्र होते तो वह कालबाह्य होकर अब उसके अवशेष मात्र रह गए होते यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं सृष्टि के आदि में (पुरा) ये दो मार्ग मेरे द्वारा कहे गये थे। इसका तात्पर्य यह है कि यहाँ भगवान् वृन्दावन के नीलवर्ण गोपाल गोपियों के प्रिय सखा अथवा अपने युग के महान् राजनीतिज्ञ के रूप में नहीं बोल रहे थे। किन्तु भारतीय इतिहास के एक स्वस्वरूप के ज्ञाता तत्त्वदर्शी उपदेशक सिद्ध पुरुष एवं ईश्वर के रूप में उपदेश दे रहे थे। उस क्षण न तो वे अर्जुन के सारथि के रूप में न एक सखा के रूप में और न ही पाण्डवों के शुभेच्छु के रूप में बात कर रहे थे। उन्हें अपने पारमार्थिक स्वरूप जगत् के अधिष्ठान कारण के रूप में पूर्ण भान था। काल और कारण के अतीत सत्यस्वरूप में स्थित हुए वे इन दो मार्गों के आदि उपदेशक के रूप में अपना परिचय देते हैं।कर्मयोग लक्ष्य प्राप्ति का क्रमिक साधन है साक्षात् नहीं। अर्थात् वह ज्ञान प्राप्ति की योग्यता प्रदान करता है जिससे ज्ञानयोग के द्वारा सीधे ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है। इसे समझाने के लिए भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
The Blessed Lord said In this world there is a twofold path, as I said before, O sinless one; the path of knowledge of the Sankhyas and the path of action of the Yogins.
Transliteration
śrī bhagavānuvāca
loke'smindvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha
jñānayogena sāṃkhyānāṃ karmayogena yogināmअनुवाद
श्री भगवान ने कहा — हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है: सांख्यवादियों के लिए ज्ञानयोग से और योगियों के लिए कर्मयोग से।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन के इस भ्रम को दूर करते हैं कि ज्ञान और कर्म में से कौन श्रेष्ठ है। वे बताते हैं कि सृष्टि के आरंभ से ही उन्होंने आत्म-साक्षात्कार के दो मार्ग निर्धारित किए हैं। चिंतनशील प्रवृत्ति वालों के लिए ज्ञानयोग और सक्रिय कर्तव्य पालन करने वालों के लिए कर्मयोग का विधान है। अंततः दोनों ही मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं।
Translation
The Supreme Lord said: O sinless one, in this world a twofold path of devotion was declared by Me in the past: the path of knowledge for the contemplative ones, and the path of action for the yogis.
Meaning
In this verse, Lord Krishna clarifies Arjuna’s confusion about whether knowledge or action is superior. He explains that since the beginning of creation, He has established two paths for spiritual realization. The path of knowledge (Jnana Yoga) is for those inclined toward contemplation, while the path of action (Karma Yoga) is for those inclined toward active duty. Both paths ultimately lead to the same goal of self-realization.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्री भगवान् | श्री भगवान |
| उवाच | ने कहा |
| लोके | लोक में |
| अस्मिन् | इस |
| द्विविधा | दो प्रकार की |
| निष्ठा | निष्ठा (मार्ग) |
| पुरा | प्राचीन काल में |
| प्रोक्ता | कही गई है |
| मया | मेरे द्वारा |
| अनघ | हे निष्पाप |
| ज्ञानयोगेन | ज्ञानयोग से |
| सांख्यानाम् | सांख्यवादियों के लिए |
| कर्मयोगेन | कर्मयोग से |
| योगिनाम् | योगियों के लिए |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrī bhagavān | the Supreme Lord |
| uvāca | said |
| loke | in the world |
| asmin | in this |
| dvividhā | twofold |
| niṣṭhā | path of devotion |
| purā | in the past |
| proktā | was declared |
| mayā | by Me |
| anagha | O sinless one |
| jñānayogena | by the path of knowledge |
| sāṃkhyānām | for the contemplative ones |
| karmayogena | by the path of action |
| yoginām | for the yogis |