Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.28
मूल श्लोक :
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे महाबाहो गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्व श्लोक में अज्ञानी का जो लक्षण बताया गया है उसकी तुलना में ज्ञानी पुरुष की उससे ठीक विपरीत दृष्टि यहाँ श्रीकृष्ण बता रहे हैं। ज्ञानी के कर्मों में आसक्ति का कोई स्थान नहीं रहता क्योंकि वह जानता है कि मन ही बाह्यजगत् में कर्मरूप में व्यक्त होता है। यह विवेक उसमें सदा जागृत रहता हैं। एक बार इस सत्य को सम्यक् रूप से जान लेने पर ज्ञानी पुरुष यह समझ लेता है कि राग और द्वेष प्रवृत्ति या निवृत्ति सफलता और विफलता ये सब मन के लिए हैं। अत उसे फल में आसक्त होने का कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता। इस प्रकार बन्धनों से मुक्त हुआ ज्ञानी पुरुष एक सच्चे खिलाड़ी के समान कार्य करता है जिसका आनन्द केवल खेल में ही हैं अंक जीतने में नहीं।इस स्थान पर श्रीकृष्ण का अर्जुन को महाबाहो कहकर सम्बोधित करना अर्थपूर्ण है। इस सम्बोधन से हमें धनुर्धारी के रूप में अर्जुन की अनेक उपलब्धियों का स्मरण होता है। यहाँ महाबाहो शब्द सूचित करता है कि सच्चा और वीर पुरुष वह नहीं जो किसी युद्ध में केवल कुछ शत्रुओं का ही वध करे बल्कि जो निरन्तर मन में चल रहे युद्ध का अथक सामना करते हुये आसक्तियों के ऊपर पूर्ण विजय प्राप्त करता है वही पुरुष वास्तविक वीर है। कर्म के युद्धक्षेत्र में परिस्थितियों पर आधिपत्य स्थापित करते हुये समस्त दिशाओं से आने वाले आसक्तियों के बाणों के समक्ष आत्मसमर्पण न करते हुये जोे कर्म करता है वही अपराजेय अमर वीर है। तत्पश्चात् वह निशस्त्र होकर र्मत्य वीरों के रथ में बैठकर प्रत्येक कुरुक्षेत्र में अनेक सेनाओं का मार्गदर्शन कर सकता है ऐसा ही पुरुष जो सत्य का ज्ञाता है तत्त्ववित कहलाता है।अब
English Translation By Swami Sivananda
But he who knows the Truth, O mighty-armed (Arjuna), about the divisions of the alities and (their) functions, knowing that the Gunas as senses move amidst the Gunas as the sense-objects, is not attached.
Transliteration
tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ
guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjateअनुवाद
परन्तु हे महाबाहु! गुण और कर्म के विभागों के तत्त्व को जानने वाला ज्ञानी, ‘गुण ही गुणों में बरत रहे हैं’ ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता है।
भावार्थ
श्रीकृष्ण अज्ञानी और ज्ञानी के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं। तत्त्वज्ञानी यह समझता है कि सभी कर्म केवल प्रकृति के तीन गुणों का आपस में कार्य-व्यवहार है। आत्मा को इन भौतिक क्रियाओं से अलग जानकर, ज्ञानी पुरुष कभी भी स्वयं को कर्ता नहीं मानता और कर्मों में आसक्त नहीं होता।
Translation
But the knower of the truth, O mighty-armed one, regarding the divisions of the gunas and actions, knowing that the gunas act upon the gunas, does not become attached.
Meaning
Krishna contrasts the ignorant person with the enlightened sage. The sage understands that all actions are merely the interplay of the three modes of material nature (gunas) interacting with each other. Realizing that the true Self is distinct from these material interactions, the wise person remains detached and free from the illusion of being the doer.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तत्त्ववित् | तत्त्व को जानने वाला |
| तु | परन्तु |
| महाबाहो | हे महाबाहु |
| गुणकर्मविभागयोः | गुण और कर्म के विभागों के |
| गुणाः | गुण |
| गुणेषु | गुणों में |
| वर्तन्ते | बरत रहे हैं |
| इति | ऐसा |
| मत्वा | मानकर |
| न | नहीं |
| सज्जते | आसक्त होता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tattvavit | the knower of the truth |
| tu | but |
| mahābāho | O mighty-armed one |
| guṇakarmavibhāgayoḥ | of the divisions of gunas and actions |
| guṇāḥ | the gunas |
| guṇeṣu | in the gunas |
| vartante | are acting |
| iti | thus |
| matvā | knowing |
| na | not |
| sajjate | becomes attached |