श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.26

मूल श्लोक :

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यह संभव है कि आत्मानुभूति के पश्चात् ज्ञानी पुरुष जब कार्य क्षेत्र में प्रवेश करे तो तत्त्वज्ञान का सर्वोच्च उपदेश देना प्रारम्भ कर दे जिसे समझने की योग्यता लोगों में न हो। उस पीढ़ी के लोग उस विद्वान पुरुष के कथन का विपरीत अर्थ लगाकर यह समझ सकते हैं कि कर्म का संन्यास सत्य की प्राप्ति का सीधा मार्ग है। ऐसे गुरुओं को यहाँ सावधान किया गया है क्यांेकि इससे लोगों का कर्म करने में उत्साह कम हो सकता है।जीवन गतिशील है। कोई भी निष्क्रिय होकर बैठ नहीं सकता। जीवन की निरन्तर अग्रगामी कर्मरूपी गतिशील धारा के प्रवाह के मध्य में यदि कोई मार्गदर्शक गुरु दोनों हाथ उठाकर अपनी पीढ़ी के लोगों को अकस्मात रुकने का आदेश दें तो उस प्रवाह में वे स्वयं ही छिन्नभिन्न होकर रह जायेंगे। अनेक धर्मोपदेशकों ने यह गलती की और उन्हें उसका मूल्य भी चुकाना पड़ा। यहाँ श्रीकृष्ण मार्गदर्शन करते हुये कहते हैं कि ऐसे धर्मोपदेशकों को चाहिये कि वे समय की गति को पहचान कर कार्य करें जीवनी शक्ति का विरोध करके नहीं।समाज के मार्गदर्शन की पद्धति इस श्लोक में बताई गई है जो समस्त नेतृत्व वर्ग के लिये उपयोगी है। वे सामाजिक राजनैतिक अथवा सांस्कृतिक किसी भी क्षेत्र में क्यों न कार्य कर रहे हों। यदि किसी काल में कोई समाज किसी विशेष दिशा में आगे बढ़ रहा हो तो नेता को अपनी पीढ़ी के साथ मिलकर स्वयं के उदाहरण के द्वारा धीरेधीरे लोगों को सही दिशा में ले जाने का प्रयत्न करना चाहिये।यदि कोई व्यक्ति हरिद्वार जाने के लिये कार को तेज गति से परन्तु विपरीत दिशा में चला रहा हो तो उसकी दिशा सुधारने का उपाय यह नहीं कि अचानक उसे रोक दें किन्तु उसकी दिशा मात्र को बदलें। कार के रुक जाने मात्र से वह किसी लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकेगा।इसी प्रकार मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिये। यदि वह गलत दिशा में भी जा रहा हो तो केवल कर्म से ही वह सही दिशा में आगे बढ़ सकता है। विद्वान् पुरुष अज्ञानी को कर्म की प्रवृत्ति से विचलित न करे बल्कि स्वयं कुशलतापूर्वक कर्म का आचरण करे जिससे सामान्य जन उसका सरलता से अनुसरण कर सकें।किस प्रकार अज्ञानी पुरुष कर्म में आसक्त होता है

English Translation By Swami Sivananda

Let no wise man unsettle the mind of ignorant people who are attached to action; he should engage them in all actions, himself fulfilling them with devotion.

Transliteration

na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām
joṣayetsarvakarmāṇi vidvān yuktaḥ samācaran

अनुवाद

ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह सकाम कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे। स्वयं योगयुक्त होकर भली-भांति कर्म करता हुआ, वह उनसे भी सभी कर्म करवाए।

भावार्थ

भगवान कृष्ण ज्ञानी पुरुषों को निर्देश देते हैं कि वे कर्मों में आसक्त अज्ञानियों को अचानक कर्म छोड़ने के लिए कहकर भ्रमित न करें। इसके विपरीत, एक ज्ञानी व्यक्ति को स्वयं अनासक्त भाव से अपने सभी कर्तव्य करते हुए एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। ऐसा करने से अज्ञानी लोग भी प्रेरित होते हैं और धीरे-धीरे निष्काम कर्म की ओर बढ़ते हैं।

Translation

Let not the wise man create a division in the minds of the ignorant who are attached to fruitive actions. The wise man, steadfast and performing his duties, should engage them in all actions.

Meaning

Krishna advises the wise not to disturb the minds of the ignorant by abruptly asking them to stop their activities. Instead, an enlightened person should set a good example by performing their own duties diligently without attachment. By doing so, they inspire the ignorant to continue working while gradually guiding them toward selflessness.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
ननहीं
बुद्धिभेदम्बुद्धि में भ्रम
जनयेत्उत्पन्न करना चाहिए
अज्ञानाम्अज्ञानियों की
कर्मसङ्गिनाम्कर्मों में आसक्त लोगों की
जोषयेत्(उन्हें) प्रवृत्त करना चाहिए
सर्वकर्माणिसभी कर्मों में
विद्वान्ज्ञानी पुरुष
युक्तःयोगयुक्त होकर
समाचरन्भली-भांति आचरण करता हुआ

Word by word

WordMeaning
nanot
buddhi-bhedamdisruption of intelligence
janayetshould generate
ajñānāmof the ignorant
karma-saṅgināmof those attached to fruitive actions
joṣayetshould engage
sarva-karmāṇiall activities
vidvānthe wise person
yuktaḥsteadfast
samācaranperforming well