श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.25

मूल श्लोक :

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्िचकीर्षुर्लोकसंग्रहम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

हम सब अपनेअपने कार्यक्षेत्रों में जीवनपर्यन्त पूर्ण उत्साह एवं रुचि के साथ कर्म करते रहते हैं। एक सामान्य मनुष्य निरन्तर कर्म के दबाव अथवा तनाव में अपने आप को थकाकर क्षीण कर लेता है। शारीरिक स्वास्थ्य ऋतु परिवर्तन की पीड़ा तथा जीवन के अन्य सुखदुख की चिन्ता न करके वह निरन्तर अधिक से अधिक धनार्जन तथा उसके उपभोग के लिए प्रयत्नशील रहता है।श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मज्ञानी पुरुष भी अज्ञानी के समान उत्साहपूर्वक अथक कर्म करता है। दोनों के कार्यों में एकमात्र अन्तर यह है कि अज्ञानी पुरुष कर्म फलों में आसक्त हुआ कर्म करता है तो ज्ञानी पुरुष पूर्ण रूप से अनासक्त हुआ केवल विश्व के कल्याण के लिये कर्मरत होता है।यह संभव है कि सामान्य मनुष्य को ज्ञानी और अज्ञानी के कर्मों के मध्य सूक्ष्म भेद विशेष महत्त्व का प्रतीत न हो जब तक कि उसका ध्यान इस ज्ञान की सार्वभौमिक उपयोगिता की ओर आकर्षित नहीं किया जाय। कर्मफल के प्रति आसक्ति और चिन्ता ही वे छिद्र हैं जिनके माध्यम से कर्त्ता की शक्ति बिखर जाती है और जीवन में उसे केवल असफलता ही हाथ लगती है। ज्ञानी पुरुष भी शरीर मन और बुद्धि से ही समस्त कर्म करता है परन्तु वह मन की शक्ति को व्यर्थ में गंवाता नहीं।मन का यह स्वभाव है कि वह किसी न किसी वस्तु के साथ आसक्त होकर ही कार्य करता है। इस श्लोक में वर्णित अनासक्ति का अर्थ है मिथ्या विषयों के प्रति मन में आकर्षण का अभाव। इसे प्राप्त करने का उपाय है  मन को उच्च और श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर प्रवृत्त करना। अत श्रीकृष्ण जब अनासक्त होकर कर्म करने का उपदेश देते हैं तब उसका उपाय भी बताते हैं कि विद्वान् पुरुष को लोक कल्याण की इच्छा से कर्म करना चाहिए।अत्यधिक अहंकारकेन्द्रित होने पर ही आसक्ति कल्याण के मार्ग में बाधक बनती है। जिस सीमा तक हम अपनी दृष्टि को व्यापक करते हुए किसी बड़ी योजना अथवा समाज के लिये कार्य करते हैं उसी सीमा तक आसक्ति का दुखदायी विष समाप्त होकर युग को आनन्द विभोर करता है। अनेक प्रकार के विष मिश्रित रूप में जीवन रक्षक औषधि का काम करते हैं जब कि वही विष अपनें तीव्र रूप में तत्काल मृत्यु का कारण बन जाते हैं। अत्यधिक आत्मकेन्द्रित इच्छायें मनुष्य को हानि पहुंचाती हैं परन्तु अपने को ऊँचा उठाकर सम्पूर्ण जगत् के साथ तादात्म्य स्थापित होने पर उसी मनुष्य के कर्म दिव्यता की आभा से मंडित होकर उसके दुखों एवं दुर्बलताओं को दूर कर देते हैं।यहाँ अर्जुन को इस प्रकार की अनासक्ति के भाव द्वारा संस्कृति के उच्च मूल्यों की रक्षा के लिये शत्रुओं के साथ युद्ध करने का उपदेश दिया गया है।जगत् की सेवा में रत विद्वान् पुरुष को निम्नलिखित सम्मति दी गयी है

English Translation By Swami Sivananda

As the ignorant men act from attachment to action, O Bharata (Arjuna), so should the wise act without attachment, wishing the welfare of the world.

Transliteration

saktāḥ karmaṇyavidvāṃso yathā kurvanti bhārata
kuryādvidvāṃstathāsaktaścikīrṣurlokasaṃgraham

अनुवाद

हे भरतवंशी! जिस प्रकार अज्ञानी जन कर्म में आसक्त होकर कार्य करते हैं, उसी प्रकार विद्वान पुरुष को अनासक्त होकर लोक-कल्याण की इच्छा से कार्य करना चाहिए।

भावार्थ

भगवान कृष्ण अज्ञानी और ज्ञानी व्यक्ति के कर्म करने के दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट करते हैं। अज्ञानी लोग अपने स्वार्थ और कर्मफलों में आसक्त होकर कार्य करते हैं, जबकि ज्ञानी व्यक्ति को वही कर्म बिना किसी आसक्ति के करने चाहिए। ज्ञानी पुरुष का उद्देश्य केवल समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करना और लोक-कल्याण करना होता है।

Translation

O descendant of Bharata, just as the ignorant act with attachment to action, so should the wise act without attachment, desiring the welfare of the world.

Meaning

Krishna explains the difference between how an ignorant person and a wise person approach their duties. While the ignorant work for personal gain and are attached to the results, the wise perform the exact same actions without any selfish attachment. The wise act solely to set a good example and ensure the welfare and maintenance of society.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सक्ताःआसक्त
कर्मणिकर्म में
अविद्वांसःअज्ञानी लोग
यथाजिस प्रकार
कुर्वन्तिकरते हैं
भारतहे भरतवंशी
कुर्यात्करना चाहिए
विद्वान्ज्ञानी पुरुष को
तथाउसी प्रकार
असक्तःअनासक्त होकर
चिकीर्षुःइच्छा करते हुए
लोकसंग्रहम्लोक-कल्याण की

Word by word

WordMeaning
saktāḥattached
karmaṇiin action
avidvāṃsaḥthe ignorant
yathāas
kurvantithey do
bhārataO descendant of Bharata
kuryātshould do
vidvānthe wise
tathāso
asaktaḥunattached
cikīrṣuḥdesiring to do
lokasaṃgrahamwelfare of the world