श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.24

मूल श्लोक :

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पार्थ अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्टभ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

ईश्वर के रूप में यदि मैं शासन न करूँ तो विश्व में उन्नति नहीं होगी और नियमबद्ध सृष्टि भी नष्ट हो जायेगी। विश्व कोई क्रमहीन रचना नहीं वरन् नियमबद्ध सृष्टि है। प्रकृति के नियम पालन में कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन होता नहीं दिखाई देता।प्राकृतिक घटनायेंे ग्रहों की गति ऋतुओं का लयबद्ध नृत्य और सृष्टि का संगीत  ये सब किसी महान् नियम के अनुसार चलते रहते हैं इसी को कहतेैं हैं प्रकृति और उसके नियामक ईश्वर की प्रबल शक्ति। इस ईश्वररूप में भगवान् के निष्क्रिय हो जाने पर ये लोक नष्ट हो जायेंगे। श्रीकृष्ण का यह कथन तर्क के विपरीत नहीं है जो केवल अन्धविश्वासी लोगों को ही स्वीकार होगा। विज्ञान की दृष्टि से विचार करने वाले लोग भी इसको अस्वीकार नहीं कर सकते।भगवान् केवल बाह्य जगत् के पदार्थों का संचालन करने वाले नियमों के ही नियामक नहीं बल्कि भावना एवं विचार के आन्तरिक जगत् के भी नियन्ता हैं। हिन्दू ऋषिमुनियों ने मानव समाज का चार वर्णों में जो वर्गीकरण किया उसका आधार मनुष्य का मानसिक स्वभाव एवं बौद्धिक क्षमता थी। यदि आन्तरिक जगत् में कोई नियम सुचारु रूप से काम न करें तो मनुष्य के व्यवहार और चरित्र में विचित्रता और अस्थिरता उत्पन्न होगी जिससे भ्रांति की वृद्धि होगी। वर्तमान में प्रचलित वर्णसंकर का अर्थ शास्त्र के विपरीत है जिसके कारण आज का शिक्षित व्यक्ति गीता की आलोचना करते हुये कह सकता है कि इसमें उच्च वर्ण की वर्चस्वता को ही भगवान की स्वीकृत है। वर्ण संकर के विषय में प्रथम अध्याय के 41वें श्लोक में विवेचन किया जा चुका है।आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने पर स्वयं को कर्म से कोई प्रयोजन न होने पर भी ज्ञानी पुरुष को कर्म करना चाहिये। कैसे

English Translation By Swami Sivananda

These worlds would perish if I did not perform action; I should be the author of confusion of castes and destruction of these beings.

Transliteration

utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham
saṅkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ

अनुवाद

यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सभी लोक नष्ट हो जाएँ। और मैं वर्णसंकर (अव्यवस्था) का कर्ता होऊँगा, तथा इन प्रजाओं को नष्ट करने वाला बनूँगा।

भावार्थ

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि यदि वे अपने नियत कर्मों को त्याग दें, तो इसके कितने भयंकर परिणाम होंगे। उनके कर्म न करने से यह संपूर्ण विश्व नष्ट हो जाएगा और समाज में भारी अव्यवस्था फैल जाएगी। एक आदर्श प्रस्तुत न करके, वे वर्णसंकर और प्रजा के विनाश का कारण बन जाएंगे।

Translation

If I did not perform action, these worlds would perish. And I would be the creator of confusion, and I would destroy these people.

Meaning

Krishna explains the catastrophic consequences that would follow if He were to abandon His duties. Without His continuous action, the universe would fall into ruin and cosmic order would be destroyed. By setting a bad example, He would cause confusion among the people, leading to the ultimate destruction of society.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
उत्सीदेयुःनष्ट हो जाएँ
इमेये
लोकाःलोक
ननहीं
कुर्याम्करूँ
कर्मकर्म
चेत्यदि
अहम्मैं
सङ्करस्यवर्णसंकर (अव्यवस्था) का
चऔर
कर्ताकर्ता (करने वाला)
स्याम्होऊँगा
उपहन्याम्मैं नष्ट करूँगा
इमाःइन
प्रजाःप्रजाओं को

Word by word

WordMeaning
utsīdeyuḥwould perish
imethese
lokāḥworlds
nanot
kuryāmI would perform
karmaaction
cetif
ahamI
saṅkarasyaof confusion
caand
kartācreator
syāmI would be
upahanyāmI would destroy
imāḥthese
prajāḥpeople