Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.23
मूल श्लोक :
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे पार्थ अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्टभ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भगवान् को कर्म क्यों करने चाहिये उनके कर्म न करने से समाज को क्या हानि होगी यह वस्तुस्थिति है कि सामान्य जन सदैव अपने नेता का अनुकरण उसकी वेषभूषा नैतिक मूल्य कर्म और सभी क्षेत्रों में उसके व्यवहार के अनुसार करते हैं। नेताओं का जीवन उनके लिये आदर्श मापदण्ड होता है। अत भगवान् के कर्म न करने पर अन्य लोग भी निष्क्रिय होकर अनुत्पादक स्थिति में पड़े रहेंगे। जबकि प्रकृति में निरन्तर क्रियाशीलता दिखाई देती है। सम्पूर्ण विश्व की स्थिति कर्म पर ही आश्रित है।गीता में भगवान् मैं शब्द का प्रयोग देवकी पुत्र कृष्ण के अर्थ में नहीं करते वरन् शुद्ध आत्मस्वरूप की दृष्टि से आत्मानुभवी पुरुष के अर्थ में करते हैं। आत्मज्ञानी पुरुष अपने उस शुद्ध चैतन्यस्वरूप को जानता है जिस पर जड़ अनात्म पदार्थों का खेल हो रहा होता है जैसे जाग्रत पुरुष के मन पर आश्रित स्वप्न। यदि इस परम तत्त्व का नित्य आधार या अधिष्ठान न हो तो वर्तमान में अनुभूत जगत् का अस्तित्व ही बना नहीं रह सकता। यद्यपि लहरों की उत्पत्ति से समुद्र उत्पन्न नहीं होता तथापि समुद्र के बिना लहरों का नृत्य भी सम्भव नहीं है। इसी प्रकार भगवान् क्रियाशील रहकर जगत् में न रहें तो समाज का सांस्कृतिक जीवन ही गतिहीन होकर रह जाय्ोगा।यदि मैं कर्म न करूँ तो क्या हानि होगी भगवान् आगे कहते हैं।
English Translation By Swami Sivananda
For, should I not ever engage Myself in action, unwearied, men would in every way follow My path, O Arjuna.
Transliteration
yadi hyahaṃ na varteyaṃ jātu karmaṇyatandritaḥ
mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥअनुवाद
हे पार्थ! यदि मैं कभी आलस्य रहित होकर कर्मों में प्रवृत्त न होऊँ, तो मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करने लगें।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि समाज के नेता या श्रेष्ठ पुरुष का आचरण कैसा होना चाहिए। यदि कृष्ण स्वयं कर्म करना छोड़ दें, तो सामान्य मनुष्य भी उन्हीं का अनुसरण करते हुए अकर्मण्य हो जाएंगे। इसलिए, लोकसंग्रह और समाज को सही दिशा दिखाने के लिए भगवान निरंतर निष्काम भाव से कर्म करते रहते हैं।
Translation
O Partha, if I were to ever not engage in action without laziness, men would follow my path in all respects.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna the profound impact a leader’s actions have on society. If Krishna were to stop performing his duties, ordinary people would follow his example and fall into inaction. Therefore, to set the right precedent and maintain the world order, the Lord continuously engages in action without any laziness.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यदि | यदि |
| हि | क्योंकि |
| अहम् | मैं |
| न | नहीं |
| वर्तेयम् | प्रवृत्त होऊँ |
| जातु | कभी |
| कर्मणि | कर्म में |
| अतन्द्रितः | आलस्य रहित होकर |
| मम | मेरे |
| वर्त्म | मार्ग का |
| अनुवर्तन्ते | अनुसरण करते हैं |
| मनुष्याः | मनुष्य |
| पार्थ | हे पार्थ (अर्जुन) |
| सर्वशः | सब प्रकार से |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yadi | if |
| hi | certainly / because |
| aham | I |
| na | not |
| varteyam | should engage |
| jātu | ever |
| karmaṇi | in action |
| atandritaḥ | without laziness |
| mama | my |
| vartma | path |
| anuvartante | follow |
| manuṣyāḥ | men |
| pārtha | O Partha (Arjuna) |
| sarvaśaḥ | in all respects |