श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.19

मूल श्लोक :

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्यकर्मका भलीभाँति आचरण कर क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् श्रीकृष्ण उपदेश के समय यह मानकर चलते हैं कि अर्जुन इस विषय में पूर्णतया अनभिज्ञ है परन्तु साथ ही वे उस पर केवल अपने विचार को थोपना भी नहीं चाहते जिन्हें अन्धविश्वासपूर्वक वह स्वीकार कर ले। धर्म परिवर्तन कराना वेदान्त का कार्य नहीं। हिन्दू लोग इससे अनभिज्ञ हैं। कोई भी विधेयात्मक (ऐसा करो) उपदेश देने के पूर्व विस्तार से तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं। कर्म के चक्र को पूर्णत बताने के बाद अब इस श्लोक में वे अन्तिम निर्णय पर पहुँच कर अर्जुन को कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।इसलिये समाज और राष्ट्र के एक योग्य नागरिक होने के नाते तुम सदैव करणीय कर्तव्यों को सम्यक् प्रकार से करो। यहाँ फिर एक बार सब कर्मों में अनासक्त रहने पर बल दिया गया है। आसक्ति अहंकार अहंकारमूलक इच्छा। अत अनासक्ति का अर्थ है  अहंकार और स्वार्थ का परित्याग। इसके पूर्व आसक्ति से वासनाओं की उत्पत्ति के विषय में बताया जा चुका है।निम्नांकित कारण से भी तुमको कर्म करने चाहिये।

English Translation By Swami Sivananda

Therefore without attachment, do thou always perform action which should be done; for by performing action without attachment man reaches the Supreme.

Transliteration

tasmādasaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara
asakto hyācarankarma paramāpnoti pūruṣaḥ

अनुवाद

इसलिए, आसक्ति से रहित होकर निरंतर करने योग्य कर्म (कर्तव्य) का भलीभांति आचरण करो। क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करने से मनुष्य परम (मोक्ष या परमात्मा) को प्राप्त होता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बिना किसी फल की इच्छा के अपना कर्तव्य निभाने का उपदेश देते हैं। जब मनुष्य व्यक्तिगत स्वार्थ या आसक्ति के बिना कर्म करता है, तो उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है। अंततः, ऐसा निष्काम कर्मयोग मनुष्य को मोक्ष और परमेश्वर की प्राप्ति कराता है।

Translation

Therefore, without attachment, always perform the action that ought to be done. For, by performing action without attachment, a person attains the Supreme.

Meaning

In this verse, Lord Krishna advises Arjuna to perform his prescribed duties without any attachment to the results. By acting purely out of duty rather than personal desire, one’s mind becomes purified. Ultimately, such selfless action (Karma Yoga) leads a person to spiritual liberation and the Supreme Lord.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तस्मात्इसलिए
असक्तःआसक्ति रहित
सततम्निरन्तर
कार्यम्करने योग्य (कर्तव्य)
कर्मकर्म
समाचरभलीभांति करो
असक्तःअनासक्त होकर
हिक्योंकि
आचरन्करता हुआ
कर्मकर्म
परम्परम को
आप्नोतिप्राप्त करता है
पूरुषःमनुष्य

Word by word

WordMeaning
tasmāttherefore
asaktaḥwithout attachment
satatamconstantly
kāryamduty
karmaaction
samācaraperform well
asaktaḥunattached
hibecause
ācaranperforming
karmaaction
paramthe Supreme
āpnotiattains
pūruṣaḥa person