श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.17

मूल श्लोक :

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो मनुष्य अपनेआपमें ही रमण करनेवाला और अपनेआपमें ही तृप्त तथा अपनेआपमें ही संतुष्ट है उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

कर्म के चक्र का पालन अधिकतर साधकों के लिए करणीय है क्योंकि यज्ञ भावना से कर्म के आचरण द्वारा उनका व्यक्तित्व संगठित होता है और उनमें जीवन के श्रेष्ठ कार्य  ध्यान की योग्यता आती है। निस्वार्थ कर्म के द्वारा प्राप्त अन्तकरण की शुद्धि एवं एकाग्रता का उपयोग जब निदिध्यासन में किया जाता है तब साधक अहंकार के परे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप की अनुभूति प्राप्त करता है। पूर्णत्व प्राप्त ऐसे सिद्ध पुरुष के लिये कर्म की चित्तशुद्धि के साधन के रूप में कोई आवश्यता नहीं रहती वरन् कर्म तो उसके ईश्वर साक्षात्कार की अभिव्यक्ति मात्र होते हैं।यह एक सुविदित तथ्य है कि तृप्ति एवं सन्तोष के लिये ही हम कर्म में प्रवृत्त रहते हैं। तृप्ति और सन्तोष मानो जीवनरथ के दो चक्र हैं। इन दोनों की प्राप्ति के लिये ही हम धन का अर्जन रक्षण परिग्रह और व्यय करने में व्यस्त रहते हैं। परन्तु आत्मानुभवी पुरुष अपने अनन्त आनन्द स्वरूप में उस तृप्ति और सन्तोष का अनुभव करता है कि उसे फिर बाह्य वस्तुओं की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।जहाँ तृप्ति और सन्तोष है वहाँ सुख प्राप्ति की इच्छाओं की उत्पत्ति कहाँ इच्छाओं के अभाव में कर्म का अस्तित्व कहाँ  इस प्रकार आत्म अज्ञान के कार्य इच्छा विक्षेप और कर्म का उसमें सर्वथा अभाव होता है। स्वाभाविक है ऐसे पुरुष के लिये कोई अनिवार्य कर्तव्य नहीं रह जाता। सभी कर्मों का प्रयोजन उसमें पूर्ण हो जाता है। अत जगत् के सामान्य नियमों में उसे बांधा नहीं जा सकता। वह ईश्वरीय पुरुष बनकर पृथ्वी पर विचरण करता है।और

English Translation By Swami Sivananda

But for that man who rejoices only in the Self, who is satisfied with the Self and who is content in the Self alone, verily there is nothing to do.

Transliteration

yastvātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ
ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṃ na vidyate

अनुवाद

परन्तु जो मनुष्य केवल आत्मा में ही रमण करने वाला है, आत्मा में ही तृप्त है और आत्मा में ही पूर्णतः सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

भावार्थ

पिछले श्लोकों में भगवान ने यज्ञ और नियत कर्मों के पालन पर जोर दिया था। इस श्लोक में वे उस ज्ञानी पुरुष का वर्णन कर रहे हैं जो आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर चुका है। जो व्यक्ति अपनी आत्मा में ही पूर्ण आनंद और संतुष्टि प्राप्त कर लेता है, वह भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। ऐसे आत्मज्ञानी महापुरुष के लिए संसार में कोई भी सांसारिक या वैदिक कर्तव्य शेष नहीं रहता।

Translation

But for the human being who takes pleasure only in the Self, who is satisfied in the Self, and who is fully content only in the Self, there is no duty to be performed.

Meaning

In previous verses, Lord Krishna emphasized the importance of performing prescribed duties and sacrifices. Here, He describes the self-realized soul who has transcended these obligations. A person who finds complete joy, satisfaction, and contentment within the Self is free from all material desires. For such an enlightened being, there are no remaining worldly or Vedic duties to fulfill.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यःजो
तुपरन्तु
आत्मरतिःआत्मा में ही रमण करने वाला
एवही
स्यात्हो
आत्मतृप्तःआत्मा में ही तृप्त
और
मानवःमनुष्य
आत्मनिआत्मा में
एवही
और
सन्तुष्टःपूर्णतः सन्तुष्ट
तस्यउसके लिए
कार्यम्कर्तव्य
नहीं
विद्यतेहै (विद्यमान है)

Word by word

WordMeaning
yaḥwho
tubut
ātmaratiḥtaking pleasure in the Self
evaonly
syātis
ātmatṛptaḥsatisfied in the Self
caand
mānavaḥhuman being
ātmaniin the Self
evaonly
caand
santuṣṭaḥfully satisfied
tasyafor him
kāryamduty
nanot
vidyateexists