श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.13

मूल श्लोक :

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

यज्ञशेष(योग) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

उत्पादन किये बिना समाज के धन पर जीने वाले अपराधी व्यक्तियों स सर्वथा भिन्न लोगों के विषय में इस श्लोक में वर्णन है। श्रेष्ठ पुरुष यज्ञ भावना से कर्म करने के पश्चात् प्राप्त फल में अपने भाग को ही ग्रहण करते हैं और इस प्रकार सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।पूर्व काल में किये गये पाप वर्तमान में पीड़ा के कारण हैं तो वर्तमान के पाप भविष्य में दुखों के कारण बनेंगे। अत समाज में दुखों को समाप्त करने का एक मात्र उपाय है समाज के जागरूक पुरुषों का यज्ञभावना से सामूहिक कर्म करके अवशिष्ट फल को ग्रहण कर सन्तुष्ट रहना।इसके विपरीत जो केवल अपने लिये ही पकाते हैं वे पाप को ही खाते हैं। इस श्लोक से प्रतीत होता है कि श्रीकृष्ण वैयक्तिक सम्पत्ति के सर्वथा विरुद्ध हैं परन्तु एक साम्यवादी व्यक्ति के अर्थ में नहीं। समाज के धन को अपना ही समझ कर उसके परिग्रह के सिद्धांत का भगवान् विरोध करते हैं। जो मनुष्य धन के लोभ से केवल अपने भोग के लिए समाज के दरिद्र और अभागे लोगों के कष्ट की ओर ध्यान दिये बिना धन संग्रह करता है उसे ही यहाँ पाप को खाने वाला कहा गया है।निम्नलिखित कारणों से भी मनुष्य को कर्म करने चाहिये क्योंकि कर्म से ही विश्वचक्र चलता है। कैसे  इसका उत्तर है

English Translation By Swami Sivananda

The righteous who eat the remnants of the sacrifice are freed from all sins; but those sinful ones who cook food (only) for their own sake verily eat sin.

Transliteration

yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ
bhuñjate te tvaghaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt

अनुवाद

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो पापी लोग केवल अपने शरीर-पोषण के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण भोजन को ग्रहण करने से पहले उसे भगवान को अर्पित करने के आध्यात्मिक सिद्धांत को समझाते हैं। जो लोग यज्ञ (भगवान को अर्पण) के बाद बचे हुए शेष भाग को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, जो लोग स्वार्थवश केवल अपने लिए ही भोजन पकाते हैं, वे वास्तव में केवल पाप ही खाते हैं और कर्म-बंधन में फँसते हैं।

Translation

The virtuous who eat the remnants of the sacrifice are freed from all sins. But those sinful ones who cook food for their own sake eat only sin.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the spiritual principle of offering food to the Divine before consuming it. Those who eat the remnants of a sacrifice are purified and freed from all karmic reactions. Conversely, those who prepare food selfishly, only for their own enjoyment, incur sin and bind themselves further to material existence.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यज्ञशिष्टाशिनःयज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले
सन्तःश्रेष्ठ पुरुष
मुच्यन्तेमुक्त हो जाते हैं
सर्वकिल्बिषैःसब पापों से
भुञ्जतेखाते हैं
तेवे
तुपरन्तु
अघम्पाप
पापाःपापी लोग
येजो
पचन्तिपकाते हैं
आत्मकारणात्केवल अपने लिए

Word by word

WordMeaning
yajñaśiṣṭāśinaḥeaters of the remnants of sacrifice
santaḥthe virtuous
mucyanteare freed
sarvakilbiṣaiḥfrom all sins
bhuñjateeat
tethey
tubut
aghamsin
pāpāḥsinners
yewho
pacanticook
ātmakāraṇātfor their own sake