श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.12

मूल श्लोक :

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है वह चोर ही है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

देवताओं को सन्तुष्ट करने पर वे हमें सन्तुष्ट करते हैं कर्मकाण्ड के इस अबाध्य सिद्धान्त को श्रीकृष्ण दोहराते हैं। देव और यज्ञ इन दो शब्दों के पारम्परिक अर्थ के स्थान पर पूर्वश्लोकों के विवरण में बताये हुये अर्थ को हम यदि स्वीकार करें तभी इस श्लोक का अर्थ सत्य प्रमाणित होता है उत्पादनक्षमता (देव) का त्याग और अर्पण की भावना से आचरित कर्म (यज्ञ) के द्वारा पोषण करने पर वह हमें इष्ट फल प्रदान करेगा। यह जीवन का नियम है।जब हम सबको यज्ञ से फल प्राप्त होता है तब उसे आपस में बांटकर उपभोग करने का हमें पूर्ण अधिकार है। किसी भी प्राणी को सामूहिक प्रयत्न में सहयोग दिये बिना दूसरे के कर्मों का लाभ नहीं उठाना चाहिये। पूँजीवादी जीवन व्यवस्था में एक यह दुष्प्रवृत्ति दिखाई देती है कि लाखों कर्मचारियों के सामूहिक कर्मों का अधिक से अधिक लाभ अकेला व्यक्ति उठाना चाहता है। इस प्रकार की दुष्प्रवृत्ति अन्तत सभी कर्मक्षेत्रों में अव्यवस्था को जन्म देती है। परिणाम यह होता है कि जीवन के सामंजस्य में अव्यवस्था फैलाने से राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिये संकट उत्पन्न हो जाता है। इस श्लोक के दूसरी पंक्ति में कही हुई बात को आधुनिक अर्थशास्त्र की भाषा में इस प्रकार कहते हैं समाज का वह व्यक्ति जो उत्पादन किये बिना भोग करता है राष्ट्र के लिये भारस्वरूप है।यज्ञ (निस्वार्थ सेवा) किये बिना जो देवताओं से भोग प्राप्त करता है भगवान् श्रीकृष्ण उसे सामाजिक चोर की संज्ञा देते हैं। गीताकालीन सम्मानित नैतिक आदर्शों को देखते हुये चोर शब्द का प्रयोग कठोर किन्तु शक्तिशाली है जो भोगी एवं सामाजिक अपराधी व्यक्ति के भ्रष्ट एवं अनादर पूर्ण स्वभाव की ओर संकेत करता है।परन्तु

English Translation By Swami Sivananda

The gods, nourished by the sacrifice, will give you the desired objects. So, he who enjoys the objects given by the gods without offering (in return) to them, is verily a thief.

Transliteration

iṣṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ
tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ

अनुवाद

यज्ञ द्वारा प्रसन्न हुए देवता निश्चय ही तुम्हें इच्छित भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दी गई वस्तुओं को उन्हें अर्पित किए बिना जो भोगता है, वह निश्चित रूप से चोर ही है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण मनुष्यों और देवताओं के बीच के परस्पर निर्भर संबंध को स्पष्ट करते हैं। देवता प्रकृति के उन तत्वों को नियंत्रित करते हैं जो जीवन के लिए आवश्यक हैं, और वे मनुष्यों द्वारा किए गए यज्ञों से पुष्ट होते हैं। इसलिए, जो कोई भी देवताओं को कृतज्ञता अर्पित किए बिना या अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन किए बिना प्रकृति के उपहारों का उपभोग करता है, उसे चोर माना गया है।

Translation

Pleased by sacrifices, the gods will indeed give you the desired enjoyments. He who enjoys the things given by them without offering them to them is certainly a thief.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the interdependent relationship between humans and the celestial beings (devas). The devas control the natural elements necessary for survival, and they are nourished by the sacrifices performed by humans. Therefore, anyone who enjoys the bounties of nature without offering gratitude or performing their prescribed duties is considered a thief.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
इष्टान्इच्छित
भोगान्भोगों को
हिनिश्चय ही
वःतुम्हें
देवाःदेवता
दास्यन्तेप्रदान करेंगे
यज्ञभाविताःयज्ञ द्वारा प्रसन्न हुए
तैःउनके द्वारा
दत्तान्दी गई वस्तुओं को
अप्रदायबिना अर्पित किए
एभ्यःउन्हें
यःजो
भुङ्क्तेभोगता है
स्तेनःचोर
एवही
सःवह

Word by word

WordMeaning
iṣṭāndesired
bhogānenjoyments
hicertainly
vaḥunto you
devāḥthe gods
dāsyantewill give
yajñabhāvitāḥpleased by sacrifices
taiḥby them
dattānthings given
apradāyawithout offering
ebhyaḥto them
yaḥwho
bhuṅkteenjoys
stenaḥthief
evacertainly
saḥhe