श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 3 · कर्मयोग

Bhagavad Gita 3.11

मूल श्लोक :

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजा(मनुष्य आदि) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्यकर्मरूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्यकर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एकदूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

वैदिक सिद्धार्न्त के अनुसार सर्वशक्तिमान् ईश्वर एक है। उसकी यह सर्वशक्ति प्रकृति में अनेक प्रकार से व्यक्त होकर सदैव कार्य करती है। विभिन्न प्रकार से व्यक्त परिच्छिन्न शक्तियों के विभिन्न नियामक हैं उन्हें देवता कहते हैं। इन सबके नाम भी वेदों में बताये हैं जैसे अग्नि वायु इन्द्र आदि।इस श्लोक के सर्वमान्य और सर्वत्र उपयुक्त होने के लिये देव शब्द का अर्थ यह समझना चाहिये कि वे किसी भी कर्म क्षेत्र का वह अधिष्ठाता देवता जो कर्म करने वाले कर्मचारी या कर्त्ता को फल प्रदान करता हो। वह देवता और कोई नहीं उस कर्म क्षेत्र की उत्पादन क्षमता ही होगी। जब हम किसी क्षेत्र विशेष में पूर्ण मनोयोग से परिश्रम करते हैं तब उस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता प्रगट होकर हमें फल प्रदान करती है। यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है यदि हम समझने का प्रयत्न करें कि अपने देश को भारतमाता कहने का हमारा क्या तात्पर्य है। राष्ट्र की शक्ति को एक रूप देने में हमारा तात्पर्य उस राष्ट्र के सभी प्रकार के कर्मक्षेत्रों की उत्पादन क्षमता से ही होता है।इसमें कोई सन्देह नहीं कि कहीं पर भी निर्माण की जो क्षमता अव्यक्त रूप में रहती है उसे व्यक्त करने के लिये आवश्यक है केवल मनुष्य का परिश्रम। इस अव्यक्त क्षमता को कहते हैं देव। इन देवों को यज्ञ कर्म से प्रसन्न कर उनका आह्वान किये जाने पर वे प्रगट होकर यज्ञकर्ता को फल प्रदान कर प्रसन्न करेंगे। इस प्रकार परस्पर उन्नति कर मनुष्य परम श्रेय को प्राप्त करेगा  यह ब्रह्माजी का दिव्य उद्देश्य इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने बताया।इस सेवाधर्म  का पालन प्रकृति में सर्वत्र होता दिखाई देता है। एक मात्र मनुष्य ही है जिसे स्वेच्छा से कर्म करने की स्वतन्त्रता दी गई है इस सार्वभौमिक सेवाधर्मयज्ञ भावना का पालन करने पर वह शुभफल प्राप्त करता है परन्तु जिस सीमा तक अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित हुआ वह कर्म करेगा उतना ही वह दुख पायेगा क्योंकि प्रकृति के सामंजस्य में वह विरोध उत्पन्न करता है।और

English Translation By Swami Sivananda

With this do ye nourish the gods and may those gods nourish you; thus nourishing one another, ye shall attain to the highest good.

Transliteration

devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ
parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha

अनुवाद

तुम लोग इस (यज्ञ) के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करो और वे देवता तुम लोगों को प्रसन्न करें। इस प्रकार एक-दूसरे को प्रसन्न करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त होओगे।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण यज्ञ के महत्व को समझाते हैं। वे कहते हैं कि यज्ञ के माध्यम से मनुष्य देवताओं को पुष्ट करते हैं और बदले में देवता वर्षा आदि के रूप में मनुष्यों का भरण-पोषण करते हैं। इस प्रकार परस्पर सहयोग से दोनों ही परम कल्याण को प्राप्त कर सकते हैं।

Translation

By this, may you nourish the gods, and may those gods nourish you. Thus nourishing one another, you shall attain the supreme good.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the importance of sacrifice (Yajna). He states that through Yajna, humans nourish the celestial gods, and in return, the gods provide for humans through rain and natural resources. By this mutual cooperation and nourishment, both can attain the highest good.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
देवान्देवताओं को
भावयतप्रसन्न करो
अनेनइसके द्वारा
तेवे
देवाःदेवता
भावयन्तुप्रसन्न करें
वःतुम लोगों को
परस्परम्एक-दूसरे को
भावयन्तःप्रसन्न करते हुए
श्रेयःकल्याण
परम्परम
अवाप्स्यथप्राप्त करोगे

Word by word

WordMeaning
devānthe gods
bhāvayatanourish
anenaby this
tethose
devāḥgods
bhāvayantumay nourish
vaḥyou
parasparamone another
bhāvayantaḥnourishing
śreyaḥgood
paramsupreme
avāpsyathayou shall attain