Chapter 3 · कर्मयोग
Bhagavad Gita 3.10
मूल श्लोक :
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजा(मनुष्य आदि) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्यकर्मरूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्यकर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एकदूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
स्वयं सृष्टिकर्त्ता प्रजापति पंचमहाभूतों की सृष्टि रचकर अन्य प्राणियों के साथ मनुष्य को भी कर्म करने और फल पाने के लिये उत्पन्न करते हैं। उस समय वे यज्ञ को भी बनाते हैं अर्थात् उसका उपदेश देते हैं। यज्ञ का अर्थ है समर्पण बुद्धि और सेवा भाव से किये हुये कर्म। प्रकृति में सर्वत्र यज्ञ की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। सूर्य प्रकाशित होता है और चन्द्रमा प्रगट होता है समुद्र स्पन्दित होता है पृथ्वी प्राणियों को धारण करती है ये सब मातृभाव से तथा यज्ञ की भावना से कर्म करते हैं जिनमें रंचमात्र भी आसक्ति नहीं होती।ब्रह्माण्ड की शक्तियाँ और प्राकृतिक घटना चक्र अपने आप सब की सेवा में संलग्न रहता है। जगत् में जीवन के प्रादुर्भाव के पूर्व ही प्रकृति ने उसके लिये उचित क्षेत्र निर्माण कर रखा था। जब विभिन्न स्तरों पर जीवन का विकास होता है तब भी हम प्रकृति में सर्वत्र चल रहा यज्ञ कर्म देख सकते हैं जिसके कारण सबका अस्तित्व बना रहता है और विकास होता रहता है।उपर्युक्त सिद्धांत को काव्यात्मकभाषा में यह अर्थ गर्भित श्लोक प्रस्तुत करता है। सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा जी ने सेवा की भावना तथा यज्ञ करने की क्षमता के साथ जगत् की रचना की। मानो उन्होंने घोषणा की इस यज्ञ में तुम वृद्धि को प्राप्त हो यह तुम्हारे लिये कामधेनु सिद्ध हो। पौराणिक कथाओं के अनुसार कामधेनु नामक गाय वशिष्ट ऋषि के पास थी जो सभी इच्छाओं की पूर्ति करती थी। इसलिये इस शब्द का अर्थ इतना ही है कि यदि मनुष्य सहयोग और अनुशासन में रह कर अनासक्ति और त्याग की भावना से कर्म करने में तत्पर रहे तो उसके लिये कोई लक्ष्य अप्राप्य नहीं हो सकता।यज्ञ से इसका कैसे सम्पादन किया जा सकता है
English Translation By Swami Sivananda
The Creator, having in the beginning (of creation) created mankind together with sacrifice, said, "By this shall ye propagate; let this be the milch cow of your desires (the cow which yields all the desired objects)."
Transliteration
sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥ
anena prasaviṣyadhvameṣa vo'stviṣṭakāmadhukअनुवाद
सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ने यज्ञ सहित प्रजाओं की रचना करके कहा, “इस यज्ञ के द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त हो, और यह यज्ञ तुम्हारी इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो।”
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण कर्मयोग के महत्व को समझाते हुए सृष्टि के आरम्भ का संदर्भ देते हैं। प्रजापति ब्रह्मा ने मनुष्यों को उनके कर्तव्यों (यज्ञ) के साथ उत्पन्न किया था। उन्होंने यह आशीर्वाद दिया कि निःस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करने से ही मनुष्य समाज की उन्नति होगी और उनकी सभी आवश्यकताएं पूरी होंगी।
Translation
In the beginning of creation, Prajapati created mankind along with sacrifices and said, “By this shall you prosper, and let this be the bestower of your desired enjoyments.”
Meaning
In this verse, Lord Krishna emphasizes the importance of Karma Yoga by referring to the beginning of creation. Prajapati (Brahma) created human beings along with their prescribed duties (Yajna). He blessed them, stating that by performing these selfless duties, mankind would prosper and all their material and spiritual needs would be fulfilled.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सहयज्ञाः | यज्ञ सहित |
| प्रजाः | प्रजाओं को |
| सृष्ट्वा | रचकर |
| पुरा | सृष्टि के आरम्भ में |
| उवाच | कहा |
| प्रजापतिः | प्रजापति ने |
| अनेन | इसके द्वारा |
| प्रसविष्यध्वम् | तुम वृद्धि को प्राप्त हो |
| एषः | यह |
| वः | तुम्हारे लिए |
| अस्तु | हो |
| इष्टकामधुक् | इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| sahayajñāḥ | along with sacrifices |
| prajāḥ | mankind |
| sṛṣṭvā | having created |
| purā | in the beginning |
| uvāca | said |
| prajāpatiḥ | the Lord of creatures |
| anena | by this |
| prasaviṣyadhvam | you shall prosper |
| eṣaḥ | this |
| vaḥ | for you |
| astu | let it be |
| iṣṭakāmadhuk | the bestower of desired enjoyments |