Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.8
मूल श्लोक :
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम् राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
पृथ्वीपर धनधान्यसमृद्ध और निष्कण्टक राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है वह दूर हो जाय ऐसा मैं नहीं देखता हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यहाँ अर्जुन संकेत करता है कि उसे तत्काल ही मार्गदर्शन की आवश्यकता है जिसके अभाव में उसे आन्तरिक पीड़ा को सहन करना पड़ रहा है। वह पीड़ा के कारण को व्यक्त करने में असमर्थ अनुभव कर रहा है। यह शोक उसकी ज्ञानेन्द्रियों पर भी प्रभाव डाल रहा है। वह न ठीक से देख सकता है और न सुन सकता है।किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिये यह स्वाभाविक है कि किसी समस्या के आने पर उसको हल करने के लिये अधीर हो उठेे। वह समस्या को शीघ्र हल करके शांति प्राप्त करना चाहता है। बेचारे अर्जुन ने अपनी बुद्धि द्वारा समस्या हल करने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु वह सफल नहीं हो सका। जैसा कि उसके शब्दों से स्पष्ट है कि अब उसका दुख भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने के लिये नहीं है क्योंकि वह स्वयं कहता है कि समस्त पृथ्वी अथवा स्वर्ग का राज्य प्राप्त करने से भी उसका दुख निवृत्त नहीं हो सकता है।अब अर्जुन की स्थिति एक तीव्र मुमुक्ष के समान है जो र्मत्य जीवन की समस्त सीमाओं और बन्धनों से मुक्त हो जाने के लिये अधीर हो उठा है। अब आवश्यकता है केवल एक प्रामाणिक विचार की जो स्वयं भगवान हृषीकेश उसे गीता के दिव्य काव्य में देते हैं।
English Translation By Swami Sivananda
I do not see that it would remove this sorrow that burns up my senses, even if I should attain prosperous and unrivalled dominion on earth or lordship over the gods.
Transliteration
na hi prapaśyāmi mamāpanudyā dyacchokamucchoṣaṇamindriyāṇām
avāpya bhūmāvasapatnamṛddham rājyaṃ surāṇāmapi cādhipatyamअनुवाद
मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखाई देता जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके, भले ही मुझे पृथ्वी पर धन-धान्य से सम्पन्न और शत्रुरहित राज्य, या देवताओं का आधिपत्य ही क्यों न मिल जाए।
भावार्थ
अर्जुन भगवान कृष्ण के समक्ष अपनी गहरी निराशा और असहायता व्यक्त करते हैं। उनका मानना है कि पृथ्वी पर एक निष्कंटक और समृद्ध राज्य या स्वर्ग में देवताओं का स्वामित्व प्राप्त करने के बाद भी उनका यह शोक दूर नहीं होगा जो उनकी इन्द्रियों को सुखा रहा है। यह श्लोक दर्शाता है कि अर्जुन को यह अहसास हो गया है कि भौतिक उपलब्धियाँ उनके नैतिक और आध्यात्मिक संकट का समाधान नहीं कर सकतीं।
Translation
I do not see what can drive away this grief that is drying up my senses, even after obtaining an unrivaled and prosperous kingdom on earth, and even sovereignty over the gods.
Meaning
Arjuna expresses his deep despair and helplessness to Lord Krishna. He feels that no material gain, not even an undisputed, prosperous kingdom on earth or the supreme power of the gods in heaven, can cure the profound grief that is paralyzing his senses. This highlights his realization that worldly achievements are insufficient to solve his moral and spiritual crisis.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| हि | निश्चय ही |
| प्रपश्यामि | मैं देखता हूँ |
| मम | मेरे |
| अपनुद्यात् | दूर कर सके |
| यत् | जो |
| शोकम् | शोक को |
| उच्छोषणम् | सुखाने वाले |
| इन्द्रियाणाम् | इन्द्रियों को |
| अवाप्य | प्राप्त करके |
| भूमौ | पृथ्वी पर |
| असपत्नम् | शत्रुरहित |
| ऋद्धम् | समृद्ध |
| राज्यम् | राज्य को |
| सुराणाम् | देवताओं के |
| अपि | भी |
| च | और |
| आधिपत्यम् | आधिपत्य को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| hi | certainly |
| prapaśyāmi | I see |
| mama | my |
| apanudyāt | can drive away |
| yat | that which |
| śokam | sorrow |
| ucchoṣaṇam | drying up |
| indriyāṇām | of the senses |
| avāpya | having obtained |
| bhūmau | on the earth |
| asapatnam | unrivaled |
| ṛddham | prosperous |
| rājyam | kingdom |
| surāṇām | of the gods |
| api | even |
| ca | and |
| ādhipatyam | sovereignty |