Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.72
मूल श्लोक :
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छतिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे पृथानन्दन यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
सब इच्छाओं के त्याग का अर्थ है अहंकार का त्याग। अहंकार रहित अवस्था निष्क्रिय अर्थहीन शून्य नहीं है। जहाँ भ्रान्तिजनित अहंकार समाप्त हुआ वहीं पर पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा प्रकाशित होता है। अपने हृदय में स्थित आत्मा को पहचानने का ही अर्थ है उसी समय सर्वत्र व्याप्त नित्य ब्रह्म को पहचानना। अहंकार के नष्ट होने पर नित्य चैतन्य आत्मा का अनुभव उससे भिन्न रहकर नहीं होता वरन् उसके साथ एकत्व का अनुभव ही होता है। अत इस साक्षात्कार को ब्राह्मी स्थिति कहा गया है।यहाँ एक शंका उठ सकती है कि क्या आत्मानुभव के पश्चात् भी हमें पुन मोहित होकर अहंकार से उत्पन्न दुखों का भोग हो सकता है ऐसे किसी पुनर्मोह का यहाँ निषेध करके भगवान् हमारे भय को दूर कर देते हैं और भी एक बात है कि आत्मसाक्षात्कार का युवावस्था में ही होना आवश्यक नहीं हैं। वृद्धावस्था अथवा जीवन के अन्तिम क्षणों में भी यदि मनुष्य अपने स्वयंसिद्ध नित्य स्वरूप को पहचान लेता है तब भी वह अनुभव ब्राह्मी स्थिति के लिए पर्याप्त है।मिथ्या का निषेध और सत्य का प्रतिपादन यही वह मार्ग है जिसका उपनिषदों में आत्मप्राप्ति के लिए उपदेश है। कर्मयोग उस ज्ञान का व्यावहारिक स्वरूप है जिसका निरूपण व्यासजी ने गीता में अपनी मौलिक शैली में किया है। अनासक्त भाव से सिद्धि और असिद्धि में समान रहते हुए कर्म करने का अर्थ है अहंकार के अधिकार को ही समाप्त करना और इस प्रकार अनजाने ही वहाँ उच्चतर सत्य की स्थापना करना। अस्तु वेदान्त के निदिध्यासन से गीता में वर्णित कर्मयोग की साधना भिन्न नहीं है। परन्तु अर्जुन भगवान् के केवल वाच्यार्थ को ही ग्रहण करता है और उसके मन में एक सन्देह उत्पन्न होता है जिसे वह तृतीय अध्याय के प्रारम्भ में व्यक्त करता है। अत अगले अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण कर्मयोग का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हैं।conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायांयोगाशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगोनाम द्वितीयोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुन संवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय समाप्त होता है।कपिल मुनि जी के सांख्य दर्शन के अर्थ में इस अध्याय का नाम सांख्ययोग नहीं है। यहाँ सांख्य शब्द का प्रयोग उसकी व्युत्पत्ति के आधार पर किया गया है जिसके अनुसार सांख्य का अर्थ हैं किसी विषय का युक्तियुक्त वह विवेचन जिसमें अनेक तर्क प्रस्तुत करने के पश्चात् किसी विवेकपूर्ण निष्कर्ष पर हम पहुँचते हैं। इस अर्थ में तत्त्वज्ञान से पूर्ण इस अध्याय को संकल्प वाक्य में सांख्ययोग कहा गया है।यह सत्य है कि मूल महाभारत में गीता के अध्यायों के अन्त में यह संकल्प वाक्य नहीं मिलते। किसी एक व्यक्ति को इनकी रचना का श्रेय देने के विषय में व्याख्याकारों में मतभेद है। तथापि यह स्वीकार किया जाता है कि एक अथवा अनेक विद्वानों ने प्रत्येक अध्याय के विषय का अध्ययन कर उसका उचित नामकरण किया है। गीता के सभी विद्यार्थियों के लिए वास्तव में ये नाम उपयोगी हैं। श्री शंकराचार्य जी ने इस विषय पर भाष्य नहीं लिखा है।
English Translation By Swami Sivananda
This is the Brahmic seat (eternal state), O son of Pritha. Attaining to this, none is deluded. Being established therein, even at the end of life, one attains to oneness with Brahman.
Transliteration
eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati
sthitvā'syāmantakāle'pi brahmanirvāṇamṛcchatiअनुवाद
हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त करके मनुष्य कभी मोहित नहीं होता। अन्तकाल (मृत्यु के समय) में भी इस स्थिति में स्थित होकर वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।
भावार्थ
यह श्लोक भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का समापन करता है। इसमें भगवान कृष्ण एक आत्म-साक्षात्कारी और स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की अंतिम अवस्था का वर्णन करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति इस दिव्य चेतना को प्राप्त कर लेता है, वह फिर कभी सांसारिक मोह में नहीं फँसता। यदि जीवन के अंतिम क्षणों में भी कोई इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित हो जाए, तो वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
Translation
O Partha, this is the state of realization in Brahman. Having attained this, one is never deluded. Being situated in this state even at the hour of death, one attains liberation in Brahman.
Meaning
This verse concludes the second chapter of the Bhagavad Gita by describing the ultimate state of a self-realized soul. Lord Krishna explains that once a person attains this divine consciousness, they are never again illusioned by material desires. Even if one reaches this state of spiritual realization at the very moment of death, they are freed from the cycle of rebirth and attain ultimate liberation in the Supreme.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| एषा | यह |
| ब्राह्मी | ब्रह्म से संबंधित (दिव्य) |
| स्थितिः | स्थिति |
| पार्थ | हे पृथापुत्र (अर्जुन) |
| न | नहीं |
| एनाम् | इसको |
| प्राप्य | प्राप्त करके |
| विमुह्यति | मोहित होता है |
| स्थित्वा | स्थित होकर |
| अस्याम् | इसमें |
| अन्तकाले | मृत्यु के समय |
| अपि | भी |
| ब्रह्मनिर्वाणम् | ब्रह्म में निर्वाण (मोक्ष) |
| ऋच्छति | प्राप्त करता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| eṣā | this |
| brāhmī | spiritual (pertaining to Brahman) |
| sthitiḥ | state |
| pārtha | O son of Pritha (Arjuna) |
| na | not |
| enām | this |
| prāpya | having attained |
| vimuhyati | is bewildered |
| sthitvā | being situated |
| asyām | in this |
| antakāle | at the time of death |
| api | even |
| brahmanirvāṇam | liberation in Brahman |
| ṛcchati | attains |