Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.70
मूल श्लोक :
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामीHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है। ऐसे ही सम्पूर्ण भोगपदार्थ जिस संयमी मनुष्यमें विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है भोगोंकी कामनावाला नहीं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यह सुविदित तथ्य है कि यद्यपि करोड़ों गैलन पानी अनेक सरिताओं द्वारा विभिन्न दिशाओं से आकर निरन्तर समुद्र में समाता रहता है तथापि समुद्र की मर्यादा किसी प्रकार भंग नहीं होती। इसी प्रकार ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से असंख्य विषय संवेदनाएँ ज्ञानी पुरुष के मन में पहुँचती रहती हैं फिर भी वे उसके अन्तकरण में किसी प्रकार का भी विकार अथवा क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकतीं।विषयों के बीच रहता हुआ इन्द्रियों के द्वारा समस्त व्यवहार करता हुआ भी जो पुरुष स्वस्वरूप की स्थिति से विचलित नहीं होता वही ज्ञानी है सन्त है। भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा पुरुष ही वास्तविक शान्ति और आनन्द प्राप्त करता है। इतना कहने मात्र से मानो उन्हें सन्तोष नहीं होता और आगे वे कहते हैं भोगों की कामना करने वाले पुरुषों को कभी शान्ति नहीं मिलती।उपर्युक्त विचार आधुनिक भौतिकवादी विचारधारा के सर्वथा विपरीत हैं। उनकी यह धारणा है कि अधिक इच्छाओं के होने से भौतिक उन्नति होगी और अधिक से अधिक इच्छाओं की पूर्ति से मनुष्य को सुखी बनाया जा सकता है। औद्योगीकरण और बड़ी मात्रा में उत्पादन के सिद्धांतों पर आधारित भौतिकवादी समाज का प्रयत्न मनुष्य में इच्छाओं की निरन्तर वृद्धि करने के लिए ही हो रहा है। परिणाम यह हुआ है कि आज के सामान्य मनुष्य की इच्छायें एक शताब्दी पूर्व अपने पूर्वजों की इच्छाओं से लाखगुना अधिक हैं। बड़ेबड़े व्यापारी और उद्योगपति विज्ञान की आधुनिक उपलब्धियों की सहायता से नईनई इच्छायें उत्पन्न करने और उन्हें पूर्ण करने का प्रयत्न करते रहते हैं। जिस मात्रा में मनुष्य की इच्छायें पूर्ण होती हैं उसे कहा जाता है कि अब वह पहले से कहीं अधिक सुखी है।इसके विपरीत भारत के प्राचीन महान् विचारकों ने स्वानुभव सूक्ष्म निरीक्षण एवं अध्ययन से यह पाया कि इच्छाओं की पूर्ति से प्राप्त सुख कभी पूर्ण नहीं हो सकता। सुख की मात्रा को गणित की भाषा में इस प्रकार बताया जा सकता है सुख की मात्रा पूर्ण हुई इच्छाओं की संख्यामन में स्थित इच्छाओं की संख्याभौतिकवादी धर्मनिरपेक्ष आधुनिक लोग भी इस सत्य को स्वीकार तो करते हैं परन्तु उनकी तथा ऋषियों की व्यावहारिक कार्यप्रणाली बहुत भिन्न दिखाई देती है।आज सर्वत्र अधिकसेअधिक इच्छाओं को पूर्ण करने का प्रयत्न सुख के लिए किया जाता है। प्राचीन ऋषिगण भी मानव समाज में ही रहते थे और तत्त्वज्ञान के द्वारा उनका लक्ष्य समाज को अधिक सुखी बनाना ही था। उन्होंने पहचाना कि इच्छाओं की संख्या कम किये बिना केवल अधिक से अधिक इच्छाओं की पूर्ति से न कोई वास्तविक आनन्द ही प्राप्त होता है और न ही उसमें कोई विशेष वृद्धि ही। परन्तु आज हम ऋषियों के विचार से सर्वथा भिन्न मार्ग अपना रहे हैं और इसीलिए समाज में आनन्द नहीं दिखाई देता।औपनिषदिक सिद्धांत का ही प्रतिपादन गीता में है जिसकी प्रशंसा भारतीय कवियों द्वारा मुक्त कण्ठ से की गई है। अनेक भोगों की कामना करने वाला पुरुष कभी शान्ति प्राप्त नहीं करता। बाह्य जगत् का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करने पर ही विषयों में हमें दुखी बनाने की सार्मथ्य आ जाती है अन्यथा वे स्वयं किसी प्रकार की हानि हमें नहीं पहुँचा सकते। आनन्दस्वरूप में स्थित ज्ञानी पुरुष इन सब विषयों से अविचलित रहता है।स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों का प्रारम्भ करते हुए भगवान् ने उसकी आत्मसन्तुष्टि एवं निष्कामत्व को बताया था उसी को और अधिक विस्तार से इस श्लोक में बताया गया है।इसलिए
English Translation By Swami Sivananda
He attains peace into whom all desires enter as waters enter the ocean which, filled from all sides, remains unmoved; but not the man who is full of desires.
Transliteration
āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ samudramāpaḥ praviśanti yadvat
tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntimāpnoti na kāmakāmīअनुवाद
जिस प्रकार सब ओर से जल से भरे जाने पर भी अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार जिस पुरुष में सभी इच्छाएँ बिना विकार उत्पन्न किए प्रवेश करती हैं, वही शांति प्राप्त करता है, न कि इच्छाओं की कामना करने वाला।
भावार्थ
यह श्लोक समुद्र के सुंदर उदाहरण के माध्यम से एक स्थितप्रज्ञ (ज्ञानी) पुरुष की मानसिक स्थिति का वर्णन करता है। जिस प्रकार अनगिनत नदियों का जल समाहित होने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता और शांत रहता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष सांसारिक इच्छाओं और भोगों के आने पर भी विचलित नहीं होता। सच्ची शांति उसी को मिलती है जो इन इच्छाओं के प्रवाह में अडिग रहता है, न कि उसे जो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के पीछे भागता रहता है।
Translation
As waters enter the ocean, which is being filled from all sides yet remains steadily situated, similarly, he whom all desires enter attains peace, not the desirer of desires.
Meaning
This verse beautifully illustrates the state of an enlightened person using the metaphor of the ocean. Just as the ocean remains calm and undisturbed despite countless rivers flowing into it, a wise person remains peaceful despite the continuous flow of desires and sensory inputs. True peace is attained by one who is unbothered by these desires, not by someone who constantly chases after them to satisfy their cravings.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आपूर्यमाणम् | सब ओर से भरे जाते हुए |
| अचलप्रतिष्ठम् | अचल स्थिति वाले |
| समुद्रम् | समुद्र में |
| आपः | जल |
| प्रविशन्ति | प्रवेश करते हैं |
| यद्वत् | जिस प्रकार |
| तद्वत् | उसी प्रकार |
| कामाः | इच्छाएँ |
| यम् | जिसमें |
| प्रविशन्ति | प्रवेश करती हैं |
| सर्वे | सभी |
| सः | वह |
| शान्तिम् | शांति को |
| आप्नोति | प्राप्त करता है |
| न | नहीं |
| कामकामी | इच्छाओं की कामना करने वाला |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| āpūryamāṇam | being filled from all sides |
| acala-pratiṣṭham | steadily situated |
| samudram | into the ocean |
| āpaḥ | waters |
| praviśanti | enter |
| yadvat | as |
| tadvat | similarly |
| kāmāḥ | desires |
| yam | whom |
| praviśanti | enter |
| sarve | all |
| saḥ | he |
| śāntim | peace |
| āpnoti | attains |
| na | not |
| kāmakāmī | the desirer of desires |