श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.7

मूल श्लोक :

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः      पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः
यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मे     शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

कायरताके दोषसे उपहत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित श्रेय हो वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मेरेको शिक्षा दीजिये।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अपने आप को असहाय अवस्था तथा कोई निर्णय लेने से सर्वथा असमर्थ पाकर अर्जुन सम्पूर्ण रूप से स्वयं को भगवान् की शरण में समर्पित कर देता है। वह स्वीकार कर रहा है कि उसकी मानसिक स्थिति नष्टभ्रष्ट हो गयी है। वह स्वयं बताता है कि उसका मुख्य कारण करुणा की अत्यधिकता है। अज्ञान के कारण वह समझ नहीं पा रहा है कि उसकी वह करुणा निराधार है। वह स्वीकार करता है कि युद्ध करने या न करने के विषय में उसकी बुद्धि भ्रमाच्छादित होने के कारण वह धर्मअधर्म का निर्णय नहीं कर पा रहा है।हम पहले ही धर्म शब्द का अर्थ देख चुके हैं। किसी वस्तु का वह गुण जिसके कारण उस वस्तु का अस्तित्व सिद्ध होता है उस वस्तु का धर्म कहलाता है। हिन्दू दर्शन मानव धर्म पर बल देता है जिसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने शुद्ध दैवी स्वरूप के अनुरूप रहना चाहिये और उसका यह प्रयत्न होना चाहिये कि वह स्वस्वरूप की महत्ता बनाये रखे और पशुवत जीवन व्यतीत न करे।यहाँ अर्जुन शिष्यभाव से भगवान् की शरण में जाता है जो यह संकेत करता है कि अब वह उपदेश ग्रहण करने योग्य हो गया है और वह भगवान् के उपदेश का पालन करेगा। एक और बात का भी संकेत मिलता है कि यदि अज्ञानवश अर्जुन अनेक बार अपनी शंका प्रस्तुत करते हुए प्रश्न पूछता है तो उसका समाधान भगवान् को सहानुभूति और धैर्यपूर्वक करना होगा। सम्पूर्ण गीता में हम अनेक स्थानों पर अर्जुन को कृष्णोपदेश के मध्य शंकायें प्रकट करते हुये देखते हैं परन्तु कहीं पर भी श्रीकृष्ण को धैर्य खोते नहीं देखते। इतना ही नहीं अर्जुन द्वारा प्रत्येक प्रश्न पूछे जाने पर वे और अधिक उत्साहित होकर युद्धभूमि में उसका उत्तर देते हैं।

English Translation By Swami Sivananda

My heart is overpowered by the taint of pity; my mind is confused as to duty. I ask Thee: Tell me decisively what is good for me. I am Thy disciple. Instruct me who has taken refuge in Thee.

Transliteration

kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharmasaṃmūḍhacetāḥ
yacchreyaḥ syānniścitaṃ brūhi tanme śiṣyaste'haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam

अनुवाद

कायरता रूपी दोष से नष्ट हुए स्वभाव वाला और धर्म के विषय में भ्रमित चित्त वाला मैं आपसे पूछता हूँ। जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह मुझे बताएँ। मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण में आया हूँ, कृपया मुझे शिक्षा दें।

भावार्थ

इस श्लोक में अर्जुन पूरी तरह से भगवान कृष्ण के समक्ष आत्मसमर्पण कर देते हैं। युद्ध के मैदान में अपने सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन का मन मोह और कायरता से भर गया था, जिससे वे अपने क्षत्रिय धर्म को भूल गए थे। अपनी इस भ्रमित स्थिति को स्वीकार करते हुए, वे कृष्ण को अपना गुरु मानते हैं और उनसे सही मार्ग दर्शन की प्रार्थना करते हैं।

Translation

With my nature afflicted by the fault of faint-heartedness, and my mind bewildered about my duty, I ask you. Tell me decisively what is best for me. I am your disciple and have surrendered to you; please instruct me.

Meaning

In this verse, Arjuna completely surrenders to Lord Krishna. Overcome by attachment and faint-heartedness upon seeing his relatives on the battlefield, he has lost sight of his duty as a warrior. Acknowledging his bewildered state, he accepts Krishna as his spiritual master and begs for decisive guidance on the right path.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
कार्पण्य-दोष-उपहत-स्वभावःकायरता रूपी दोष से नष्ट हुए स्वभाव वाला
पृच्छामिमैं पूछता हूँ
त्वाम्आपसे
धर्म-संमूढ-चेताःधर्म के विषय में भ्रमित चित्त वाला
यत्जो
श्रेयःकल्याणकारी
स्यात्हो
निश्चितम्निश्चित रूप से
ब्रूहिकहें
तत्वह
मेमेरे लिए
शिष्यःशिष्य
तेआपका
अहम्मैं
शाधिशिक्षा दें
माम्मुझे
त्वाम्आपकी
प्रपन्नम्शरण में आया हुआ

Word by word

WordMeaning
kārpaṇya-doṣa-upahata-svabhāvaḥhaving a nature afflicted by the fault of faint-heartedness
pṛcchāmiI am asking
tvāmyou
dharma-saṃmūḍha-cetāḥbewildered in mind about duty
yatwhat
śreyaḥultimate good
syātmay be
niścitamdecisively
brūhitell
tatthat
meto me
śiṣyaḥdisciple
teyour
ahamI am
śādhiinstruct
māmme
tvāmunto you
prapannamsurrendered