Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.64
मूल श्लोक :
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छतिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी प्रसन्नताको प्राप्त हो जाता है। प्रसन्नता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे प्रसन्नचित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जो पुरुष आत्मसंयम से युक्त होकर जीवन में अनेक विषयों को ग्रहण करता है परन्तु न किसी से राग रखता है और न द्वेष वह शांति और प्रसन्नता ही प्राप्त करता है। विषयों से दूर भागने से किसी को शांति नहीं मिलती क्योंकि अन्तकरण की अशान्ति बाह्य विषयों के होने या न होने पर निर्भर नहीं करती उसका प्रमुख कारण प्रिय वस्तु को पाने की लालसा अथवा अप्रिय को त्यागने की इच्छा है।किन्तु पूर्ण आत्मनियन्त्रक ज्ञानी पुरुष अशान्ति के इन कारणों से सर्वथा मुक्त हुआ विचरण करता है। जैसे हम जहाँ कहीं भी जायें प्रकाश की स्थिति के अनुसार हमारी छाया हमारे आसपास बनी रहती है परन्तु वह छाया स्वयं किसी प्रकार हमें न राग के द्वारा बाँध सकती है और न द्वेष के कारण नष्ट ही कर सकती है बाह्य विषय जगत् केवल उस व्यक्ति को कष्ट पहुँचाता है जो स्वयं उन विषयों को ऐसी शक्ति प्रदान करता है कि वे उसको ही चूरचूर कर देंयदि कोई पागल व्यक्ति हाथ में चाबुक लेकर अपने ही शरीर पर मारता हुआ पीड़ा से रोये तो उसके दुखों का अन्त तभी होगा जब वह चाबुक को छोड़ देगा अथवा यदि चाबुक को हाथ में रखे तब भी उसे अपने शरीर पर ही न घुमाये इसी प्रकार मन ही विषयों में सुन्दरता आदि का आरोप कर उनको पाने के लिये परिश्रम करता है और स्वयं ही दुखी होता है। उपदेश की दृष्टि से यहाँ कहा गया है कि आत्मसंयमी पुरुष राग और द्वेष न रखकर विषयों को अपनी ओर से शक्ति नहीं देता कि वे उसे ही पीड़ित करें।आत्मसंयम तथा रागद्वेष का अभाव इन दो गुणों के होने पर विषयों के आकर्षण से उत्पन्न होने वाले मन के विक्षेप स्वत कम होने लगते हैं। मन की विक्षेपरहित स्थिति को ही शान्ति अथवा प्रसाद कहते हैं।पूजन विधि के अन्त में प्रसाद वितरण की क्रिया इस सिद्धान्त की ही द्योतक है। पूजन अथवा यज्ञ करते समय मनुष्य को संयमित रहकर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये जिसके फलस्वरूप वह मन में अपूर्व शान्ति का अनुभव करता है। वास्तव में इसको ही ईश्वर प्रसाद कहा जाता है। वेदान्ती चित्तशुद्धि को प्रसाद समझते हैं। रागद्वेष के अभाव में विक्षेपों का अभाव स्वाभाविक है और यही है चित्तशुद्धि।प्रसाद को प्राप्त करने पर क्या होगा सुनो
English Translation By Swami Sivananda
But the self-controlled man, moving among the objects with the senses under restraint and free from attraction and repulsion, attains to peace.
Transliteration
rāgadveṣaviyuktaistu viṣayānindriyaiścaran
ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchatiअनुवाद
परन्तु राग और द्वेष से मुक्त, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरता हुआ, स्वाधीन अन्तःकरण वाला पुरुष शान्ति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक आत्म-संयमी व्यक्ति की स्थिति का वर्णन करते हैं। जो व्यक्ति राग और द्वेष से मुक्त होकर, अपने वश में की गई इन्द्रियों से विषयों का अनुभव करता है, वह कभी उनमें लिप्त नहीं होता। ऐसा स्वाधीन और संयमित मन वाला मनुष्य परम शान्ति और ईश्वर की कृपा को प्राप्त करता है।
Translation
But a person free from attachment and aversion, moving among sense objects with senses under the control of the self, having a regulated mind, attains tranquility.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the state of a self-controlled person. Even while moving among sense objects, a person whose mind is regulated and whose senses are free from attachment and aversion does not get entangled. Such a disciplined individual attains profound peace and the grace of the Lord.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| रागद्वेषवियुक्तैः | राग और द्वेष से मुक्त |
| तु | परन्तु |
| विषयान् | विषयों में |
| इन्द्रियैः | इन्द्रियों के द्वारा |
| चरन् | विचरता हुआ |
| आत्मवश्यैः | अपने वश में की हुई |
| विधेयात्मा | वश में किए हुए मन वाला |
| प्रसादम् | शान्ति को |
| अधिगच्छति | प्राप्त करता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| rāgadveṣaviyuktaiḥ | free from attachment and aversion |
| tu | but |
| viṣayān | sense objects |
| indriyaiḥ | by the senses |
| caran | moving among |
| ātmavaśyaiḥ | controlled by the self |
| vidheyātmā | one with a regulated mind |
| prasādam | tranquility |
| adhigacchati | attains |