Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.63
मूल श्लोक :
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यतिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस श्लोक के आगे पाँच सुन्दर श्लोकों में श्रीकृष्ण हिन्दू मनोविज्ञान के अनुसार देवत्व की स्थिति से मनुष्य के पतन का कारण बताते हैं। इसका एक मात्र प्रयोजन है महाबाहु अर्जुन को सभी ओर से इन्द्रियों को वश में रखने के महत्व को समझाना। इन्द्रियों पर स्वामित्व रखने वाला पुरष ही हिन्दू शास्त्रों के अनुसार स्थितप्रज्ञ कहलाता है।यह प्रकरण उन समस्त साधकों के आत्मचरित्र की रूपरेखा भी प्रस्तुत करता है जो दीर्घ काल तक साधनारत रहने के उपरान्त भी असफलता एवं निराशा की चट्टानों से टकराकर चूरचूर हो जाते हैं। वेदान्त के सच्चे साधक का पतन असम्भव है। असफल साधकों के उदाहरण कम नहीं हैं और उन सभी की असफलता का एक मात्र कारण विषयों के शिकार होना ही है। यह भी देखा गया है कि एक बार पतन होने पर वे फिर सम्हल नहीं पाते उनके लिये पतन का अर्थ है सम्पूर्ण नाश पतन की सीढ़ी का यह बहुत सुन्दर वर्णन है। स्वयं के नाश की सीढ़ी का वर्णन इतना विस्तारपूर्वक इसलिये किया गया है कि हमारे जैसे साधक यह समझ सकें कि पुन अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।जैसे छोटे से बीज से बड़े वृक्ष की उत्पत्ति होती है वैसे ही हमारे नाश का बीज है असद् विचार और मिथ्या कल्पनायेंे। विचार में रचना शक्ति है यह हमारा निर्माण अथवा नाश कर सकती है। निर्माण और विनाश उस शक्ति के सदुपयोग और दुरुपयोग पर निर्भर करते हैं। जब मनुष्य किसी विषय को सुन्दर और सुख का साधन समझकर उसका निरन्तर चिन्तन करता है तब उससे उत्पन्न होती है उस विषय में आसक्ति। इस आसक्ति के और अधिक बढ़ने पर वह उसकी उत्कट इच्छा या कामना का रूप लेती है जिसको पूर्ण किये बिना मनुष्य शान्ति से नहीं बैठ सकता। यदि कामना पूर्ति के मार्ग में कोई विघ्न आता है तो उस विघ्न की ओर होने वाली प्रतिक्रिया को कहते हैं क्रोध।क्रोध का परिणाम यह होता है कि मनुष्य जहाँ जो वस्तु या गुण नहीं है उसे वहाँ देखने लग जाता है जिसे मोह नाम दिया गया है। मोह का अर्थ है अविवेक। मोह ही स्मृति के नाश का कारण है। क्रोध के आवेश में मनुष्य सभी सम्बन्ध भूलकर चाहें जैसा व्यवहार कर सकता है। श्रीशंकराचार्य लिखतें हैं कि क्रोधावेश में मनुष्य अपने पूज्य गुरु एवं मातापिता के ऋण को भूलकर उनका भी तिरस्कार करता है।इस प्रकार असद् विचारों से प्रारम्भ होकर आसक्ति (संग) इच्छा क्रोध मोह और स्मृति के नाश तक जब मनुष्य का पतन हुआ तो अगली सीढ़ी है बुद्धि का नाश। बुद्धि में विवेक की वह सार्मथ्य है जिससे हम अच्छेबुरे धर्मअधर्म का निर्णय कर सकते हैं। निषिद्ध कर्मों को करते समय बुद्धि हमें उससे परावृत्त करने का प्रयत्न भी करती है। यदि यह बुद्धि ही नष्ट हो जाय तो मनुष्य का मनुष्यत्व ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। बुद्धिनाश के बाद तो वह पशु से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी जीवन में श्रेष्ठ और उच्च ध्येय को न समझ सकता है और न प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान कर वह मनुष्य जीवन के परमपुरुषार्थ मोक्ष को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।विषयों के चिन्तन को यहाँ सभी अनर्थों का कारण बताया है। अब मोक्ष प्राप्ति का साधन बताते हैं
English Translation By Swami Sivananda
From anger comes delusion; from delusion loss of memory; from loss of memory the destruction of discrimination; from the destruction of discrimination he perishes.
Transliteration
krodhādbhavati saṃmohaḥ saṃmohātsmṛtivibhramaḥ
smṛtibhraṃśād buddhināśo buddhināśātpraṇaśyatiअनुवाद
क्रोध से अत्यन्त मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मनुष्य का पतन हो जाता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण पतन की क्रमिक प्रक्रिया को समझाते हैं। जब इच्छा पूरी नहीं होती तो क्रोध उत्पन्न होता है, जिससे सोचने-समझने की शक्ति खो जाती है और मोह पैदा होता है। मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है, जिससे सही-गलत का निर्णय करने वाली बुद्धि नष्ट हो जाती है और अंततः मनुष्य का पूर्ण पतन हो जाता है।
Translation
From anger arises complete delusion; from delusion, bewilderment of memory. From loss of memory, the destruction of intelligence; and from the destruction of intelligence, one perishes.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the sequential process of a person’s downfall. Unfulfilled desires lead to anger, which clouds judgment and creates delusion. Delusion bewilders the memory, destroying the intellect’s ability to discriminate between right and wrong, ultimately leading to the complete ruin of the individual.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| क्रोधात् | क्रोध से |
| भवति | उत्पन्न होता है |
| संमोहः | मोह |
| संमोहात् | मोह से |
| स्मृतिविभ्रमः | स्मृति का भ्रम |
| स्मृतिभ्रंशात् | स्मृति के नाश से |
| बुद्धिनाशः | बुद्धि का नाश |
| बुद्धिनाशात् | बुद्धि के नाश से |
| प्रणश्यति | नष्ट हो जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| krodhāt | from anger |
| bhavati | arises |
| saṃmohaḥ | delusion |
| saṃmohāt | from delusion |
| smṛtivibhramaḥ | bewilderment of memory |
| smṛtibhraṃśāt | from loss of memory |
| buddhināśaḥ | destruction of intelligence |
| buddhināśāt | from destruction of intelligence |
| praṇaśyati | one perishes |