श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.60

मूल श्लोक :

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्िचतः
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे कुन्तीनन्दन (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अब तक के अपने प्रवचन में भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञानी पुरुष के इन्द्रिय संयम की सार्मथ्य पर विशेष बल दिया है। भारत में दर्शनशास्त्र के सिद्धान्तों को अव्यावहारिक होने पर स्वीकारा नहीं जाता। अत गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को उन साधनों का भी उपदेश देते हैं जिनके अभ्यास से वह भी स्थितप्रज्ञ के पूर्णत्व को प्राप्त कर सकता है।सत्त्व (विवेकशीलता) रज (क्रियाशीलता ) और तम (निष्क्रियता) इन तीन गुणों का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण पर पड़ता है। तमोगुण के आवरण तथा रजोगुण के विक्षेप के कारण जब सत्त्व गुण भी दूषित हो जाता है तब अनेक दुखों को हमें भोगना पड़ता है। यदि इन्द्रियों पर पूर्ण संयम न हो तो वे मन को विषयों की ओर बलपूर्वक खींच ले जायेंगी जिसका एक मात्र परिणाम होगा दुख। इस श्लोक में स्वीकार किया गया है कि ऐसी स्थिति किसी बुद्धिमान साधक की भी कभीकभी होती है। यह वाक्य भयभीत करने या किसी को निरुत्साहित करने के लिए नहीं समझना चाहिए। अर्जुन को केवल इस बात की सावधानी रखने को कहा गया है कि वह कभी अपने मन का बुद्धि पर आधिपत्य स्थापित न होने दे। सावधानी की यह सूचना अत्यन्त समयोचित है।अध्यात्म साधना का अभ्यास करने वाले अनेक साधकों के पतन का कारण एक ही है। कुछ वर्षों तक तो वे संयम के प्रति सजग रहते हैं जिसके फलस्वरूप उन्हें आनन्द भी मिलता है। तत्पश्चात् स्वयं पर अत्यधिक विश्वास के कारण तप के प्रति उनकी जागरूकता कम हो जाती है और तब स्वाभाविक ही इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को विषयों में खींच ले जाती हैं और साधक की शान्ति को नष्ट कर देती हैं।

English Translation By Swami Sivananda

The turbulent senses, O Arjuna, do violently carry away the mind of a wise man though he be striving (to control them).

Transliteration

yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ
indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष की भी प्रमथन स्वभाव वाली (मथ डालने वाली) इन्द्रियाँ उसके मन को बलपूर्वक हर लेती हैं।

भावार्थ

भगवान कृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों की अपार शक्ति के विषय में सचेत करते हैं। वे बताते हैं कि आध्यात्मिक पूर्णता के लिए निरंतर प्रयास करने वाले एक अत्यंत बुद्धिमान और विवेकी पुरुष का मन भी इन चंचल इन्द्रियों द्वारा बलपूर्वक विचलित कर दिया जाता है। अतः साधक को कभी भी असावधान नहीं होना चाहिए और इन्द्रिय-निग्रह के प्रति सदैव सतर्क रहना चाहिए।

Translation

O son of Kunti, the turbulent senses forcibly carry away the mind even of a wise man who is striving for perfection.

Meaning

Lord Krishna warns Arjuna about the immense power of the senses. Even a highly intelligent and discerning person, who is actively striving for spiritual perfection, can fall prey to their turbulent nature. Therefore, one must not be complacent but constantly vigilant in controlling the senses.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यततःयत्न करते हुए
हिनिश्चय ही
अपिभी
कौन्तेयहे कुन्तीपुत्र
पुरुषस्यपुरुष के
विपश्चितःबुद्धिमान (विवेकी)
इन्द्रियाणिइन्द्रियाँ
प्रमाथीनिक्षुब्ध करने वाली
हरन्तिहर लेती हैं
प्रसभम्बलपूर्वक
मनःमन को

Word by word

WordMeaning
yatataḥof the striving
hicertainly
apieven
kaunteyaO son of Kunti
puruṣasyaof a man
vipaścitaḥwise
indriyāṇithe senses
pramāthīniturbulent
haranticarry away
prasabhamby force
manaḥthe mind