Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.59
मूल श्लोक :
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्ततेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
प्रत्याहार या उपरति की क्षमता के बिना कभी कोई व्यक्ति किसी रोग के कारण या क्षणिक दुख के आवेग में अथवा व्रत आदि कारणों से विषय उपभोग को छोड़ देता है। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि विषयों से वैराग्य अथवा द्वेष हो गया है किन्तु उनके प्रति मन में स्थित राग केवल कुछ समय के लिये अव्यक्त अवस्था में रहता है। अर्जुन के मन में शंका उत्पन्न होती है कि संभवत योगी का इन्द्रिय संयम भी क्षणिक अनित्य ही हो जो अनुकूल या प्रलोभनपूर्ण परिस्थितियों में टूट जाता हो। उसकी इस शंका का निवारण यहाँ किया गया है।यदि आप दुकानों से ग्राहकों तक उपभोग के विषय की गति का अवलोकन करें तो इस सिद्धांत को स्पष्ट रूप में समझ सकते हैं। उपभोग की वे वस्तुयें केवल उन्हीं लोगों के घर पहुँचती हैं जो उनकी तीव्र इच्छा किये हुये उन वस्तुओं को पाने के लिये प्रयत्न कर रहे होते हैं। मद का भण्डार तब खाली हो जाता है जब बोतलें चलकर मद्यपियों की आलमारियों को भर देती हैं लुहार के बनाये हल केवल किसान के घर जाते हैं और न कि किसी कलाकार कवि चिकित्सक या वकील के घर में। इसी प्रकार उन विषयों के इच्छुक लोगों के पास ही वे विषय पहुँचते हैं। भोगों के त्यागी व्यक्ति से भोग की वस्तुयें दूर ही रहती हैं।निराहार रहने से विषय तो दूर हो जायेंगे परन्तु उनके प्रति मन में पूर्वानुभवजनित रस अर्थात् स्वाद या राग निवृत्त नहीं होता। भगवान् यहाँ आश्वासन देते हैं कि परम आत्मतत्त्व की अपरोक्षानुभूति होने पर यह राग भी समाप्त हो जाता है या भुने हुये बीजों के समान मनुष्य के मन में विषय प्रभावहीन हो जाते हैं।इस तथ्य को समझना कठिन नहीं क्योंकि हम जानते हैं कि अनुभव की एक अवस्था विशेष में प्राप्त अनिष्ट वस्तुयें और दुख दूसरी अवस्था में उसी प्रकार नहीं रहते। स्वप्नावस्था का राज्य मेरी जाग्रदवस्था के दारिद्र्य को दूर नहीं करता किन्तु जाग्रदवस्था का दारिद्र्य भी स्वप्न के राज्य का उपभोग करने से मुझे वंचित नहीं कर सकता जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में रहते हुए अहंकार ने असंख्य विषय वासनायें अर्जित कर ली हैं। परन्तु अवस्थात्रय अतीत शुद्ध चैतन्य स्वरूप को पहचान कर अहंकार ही समाप्त हो जाता है तब ये वासनायें किस पर अपना प्रभाव दिखायेंगी।आत्मप्रज्ञा प्राप्त करने के इच्छुक साधक का सर्वप्रथम उसकी इन्द्रियों पर संयम होना आवश्यक है अन्यथा
English Translation By Swami Sivananda
The objects of the senses turn away from the abstinent man leaving the longing (behind); but his longing also turns away on seeing the Supreme.
Transliteration
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ
rasavarjaṃ raso'pyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartateअनुवाद
इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण न करने वाले देहधारी पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति (रस) निवृत्त नहीं होती। उस परमेश्वर का साक्षात्कार कर लेने पर इस पुरुष की वह आसक्ति भी निवृत्त हो जाती है।
भावार्थ
कोई भी व्यक्ति हठपूर्वक अपनी इन्द्रियों को विषयों से रोक सकता है, लेकिन मन में उन विषयों के प्रति लालसा या रस बना रहता है। जब साधक को परमात्मा के परम आनंद की अनुभूति हो जाती है, तब उसकी यह सूक्ष्म लालसा भी पूरी तरह से समाप्त हो जाती है। सच्ची इन्द्रिय-निग्रह केवल शारीरिक संयम से नहीं, बल्कि ईश्वर में उच्चतर आनंद प्राप्त करने से सिद्ध होती है।
Translation
The sense objects turn away from the embodied soul who abstains from feeding on them, but the taste for them remains. Even this taste turns away from him having seen the Supreme.
Meaning
A person can forcefully restrain their senses from interacting with sense objects, but the internal desire or taste for those objects often remains. However, when one experiences the higher spiritual bliss of the Supreme, this lingering desire completely vanishes. True sense control is achieved not just by physical abstinence, but by finding a higher, superior joy in God.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| विषयाः | इन्द्रियों के विषय |
| विनिवर्तन्ते | निवृत्त हो जाते हैं |
| निराहारस्य | विषयों को ग्रहण न करने वाले |
| देहिनः | देहधारी के |
| रसवर्जम् | रस (आसक्ति) को छोड़कर |
| रसः | रस (आसक्ति) |
| अपि | भी |
| अस्य | इस (पुरुष) का |
| परम् | परम (परमात्मा) को |
| दृष्ट्वा | देखकर (साक्षात्कार करके) |
| निवर्तते | निवृत्त हो जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| viṣayāḥ | sense objects |
| vinivartante | turn away |
| nirāhārasya | of the abstinent |
| dehinaḥ | of the embodied soul |
| rasavarjam | leaving the taste (longing) behind |
| rasaḥ | taste (longing) |
| api | even |
| asya | his |
| param | the Supreme |
| dṛṣṭvā | having seen |
| nivartate | turns away |