Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.58
मूल श्लोक :
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिताHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
ज्ञानी पुरुष के आत्मानन्द समत्व और अनासक्त भाव का वर्णन करने के पश्चात् इस श्लोक में इन्द्रियों पर उसके पूर्ण संयम का वर्णन किया गया है। अत्यन्त उपयुक्त उपमा के द्वारा उसके लक्षण को यहाँ स्पष्ट किया गया है। जैसे कछुवा किसी प्रकार के संकट का आभास पाकर अपने अंगों को समेट कर स्वयं को सुरक्षित कर लेता है वैसे ही ज्ञानी पुरुष में यह क्षमता होती है कि वह अपनी इच्छा से इन्द्रियों को विषयों से परावृत्त तथा उनमें प्रवृत्त भी कर सकता है।वेदान्त के प्रत्यक्ष ज्ञान की प्रक्रिया के अनुसार अन्तकरण की चैतन्य युक्त वृत्ति इन्द्रियों के माध्यम से बाह्य देश स्थित विषय का आकार ग्रहण करती हैं और तब उस विषय का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इस प्रक्रिया को कठोपनिषद् में इस प्रकार कहा गया है कि मानों चैतन्य का प्रकाश मस्तकस्थ सात छिद्रों (दो नेत्र दो कान दो नासिका छिद्र और मुख) के द्वारा बाहर किरण रूप में निकलकर वस्तुओं को प्रकाशित करता है। इस प्रकार एक विशेष इन्द्रिय द्वारा एक विशिष्ट वस्तु प्रकाशित होती है जैसे आँख से रूप रंग और कान से शब्द। भौतिक जगत् में हम विद्युत का उदाहरण ले सकते हैं जो सामान्य बल्ब में प्रकाश के रूप में व्यक्त होकर वस्तुओं को प्रकाशित करती है और वही विद्युत क्षकिरण नलिका से गुजर कर स्थूल शरीर को भेदकर आंतरिक अंगों को भी प्रकाशित कर सकती है जो सामान्यत प्रत्यक्ष नहीं होते।इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सम्पूर्ण बाह्य जगत् का ज्ञान प्राप्त करता है। इन्द्रियों द्वारा निरन्तर प्राप्त होने वाली विषय संवेदनाओं के कारण मन में अनेक विक्षेप उठते रहते हैं। नेत्रों के अभाव में रूप से उत्पन्न विक्षेप नहीं होते और बधिर पुरुष को अपनी आलोचना सुनाई नहीं पड़ती जिससे कि उस के मन में क्षोभ हो यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी है। भगवान् कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष में यह क्षमता होती है कि वह स्वेचछा से इन्द्रियों को विषयों से परावृत्त कर सकता है।इन्द्रिय संयम की इस क्षमता को योगशास्त्र में प्रत्याहार कहते हैं जिसे योगी प्राणायाम की सहायता से प्राप्त करता है। ईश्वर की रूप माधुरी में प्रीति होने के कारण भक्त के मन में विषयजन्य विक्षेपों का अभाव स्वाभाविक रूप से ही होता है वेदान्त में इसे उपरति कहते हैं जिसे जिज्ञासु साधक अपने विवेक के बल पर विषयों की परिच्छिन्नता और व्यर्थता एवं आत्मा के आनन्दस्वरूप को समझकर प्राप्त करता है।रोग अथवा किसी अन्य कारण से विषयोपभोग न करने वाले पुरुष से विषय तो दूर हो जाते हैं परन्तु उनका स्वाद नहीं। इस स्वाद की भी निवृत्ति किस प्रकार हो सकती है सुनो
English Translation By Swami Sivananda
When, like the tortoise which withdraws on all sides its limbs, he withdraws his senses from the sense-objects, then his wisdom becomes steady.
Transliteration
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo'ṅgānīva sarvaśaḥ
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitāअनुवाद
और जब यह (योगी) सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से वैसे ही समेट लेता है जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति (स्थितप्रज्ञ) का लक्षण बताते हैं। जैसे कछुआ किसी खतरे का आभास होने पर अपने अंगों को खोल के भीतर खींच लेता है, वैसे ही एक आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को सांसारिक विषयों से हटा लेता है। इन्द्रियों पर यह पूर्ण नियंत्रण ही स्थिर प्रज्ञा या सच्ची आध्यात्मिक जागरूकता की निशानी है।
Translation
And when this yogi completely withdraws the senses from the sense objects, just as a tortoise withdraws its limbs from all sides, his wisdom is steady.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains a key characteristic of a person with steady wisdom (sthitaprajna). Just as a tortoise withdraws its limbs into its shell when sensing danger, a self-realized person withdraws their senses from worldly objects. This complete mastery over the senses is the hallmark of steady consciousness and true spiritual awareness.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यदा | जब |
| संहरते | समेट लेता है |
| च | और |
| अयम् | यह |
| कूर्मः | कछुआ |
| अङ्गानि | अंगों को |
| इव | समान |
| सर्वशः | सब ओर से |
| इन्द्रियाणि | इन्द्रियों को |
| इन्द्रियार्थेभ्यः | इन्द्रियों के विषयों से |
| तस्य | उसकी |
| प्रज्ञा | बुद्धि |
| प्रतिष्ठिता | स्थिर है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yadā | when |
| saṃharate | withdraws |
| ca | and |
| ayam | this |
| kūrmaḥ | tortoise |
| aṅgāni | limbs |
| iva | like |
| sarvaśaḥ | completely |
| indriyāṇi | the senses |
| indriyārthebhyaḥ | from the sense objects |
| tasya | his |
| prajñā | wisdom |
| pratiṣṭhitā | is fixed |