श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.57

मूल श्लोक :

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

सब जगह आसक्तिरहित हुआ जो मनुष्य उसउस शुभअशुभको प्राप्त करके न तो अभिनन्दित होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

स्फूर्ति और प्रेरणा से भरा एक कुशल चित्रकार अपनी कल्पनाओं को विभिन्न रंगों के माध्यम से एक फलक पर व्यक्त करते समय बारम्बार अपने स्थान से पीछे हट कर चित्र को देखता है और प्रत्येक बार अत्यन्त प्रेम से अपनी तूलिका से चित्र का सौन्दर्य वर्धन करता है। यहाँ भगवान् श्री कृष्ण ज्ञानी पुरुष के चित्र को अर्जुन के हृदय पटल पर चित्रित करते हुये चुने हुये शब्दों में ज्ञानी के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर और अधिक प्रकाश डालते हैं।यहाँ स्थितप्रज्ञ पुरुष की अनासक्ति का वर्णन है। इस श्लोक को भी प्रकरण के सन्दर्भ में उचित प्रकार से समझना चाहिये अन्यथा कोई भी उसका विपरीत अर्थ कर सकता है। जीवन से अनासक्ति मात्र विवेक का लक्षण नहीं हो सकता। अनेक मूढ़ उत्साही लोग जीवन में अपने कर्तव्यों को त्यागकर जंगलों में इस आशा से पलायन कर जाते हैं कि इस प्रकार के वैराग्य से उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी। अर्जुन भी पहले यही करना चाहता था। अर्जुन को इस अनर्थकारी निर्णय से विरत करने के लिये ही भगवान् ने उसे उपदेश देना प्रारम्भ किया।विषयों के साथ आत्मघातक संग और मूढ़ आसक्ति से स्वयं को इस प्रकार दूर कर लेने मात्र से ही उच्च दिव्य लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती। बाह्य विषयों से वैराग्य होने के साथसाथ सभी परिस्थितियों का सामना करने के लिए मन के आन्तरिक सन्तुलन की भी आवश्यकता होती है। शुभ प्राप्ति में हर्षातिरेक का और अशुभ प्राप्ति में द्वेष और विषाद का अभाव  ये आत्मज्ञानी के लक्षण हैं।अनासक्ति अपने आप में श्रेष्ठ जीवन का मार्ग नहीं है क्योंकि वह तो जीवन से निरन्तर पलायन ही समझा जायेगा। उसी प्रकार जगत् में आसक्त होना परवशता का लक्षण है। ज्ञानी पुरुष में ये दोनों ही बातें नहीं होतीं  वह तो जीवन में आने वाली सभी परिस्थितियों में समान भाव से रहता है। शीत ऋतु में घर के बाहर सूर्य की धूप सेंकना जहाँ आनन्द है वहीं उसकी चमक कष्ट का कारण भी है। सूर्य की चमक के प्रति असन्तोष प्रकट करना धूप के आनन्द को नष्ट करना है। बुद्धिमान पुरुष या तो उस चमक की ओर ध्यान नहीं देता अथवा चमक से अपने को सुरक्षित रखते हुये धूप का आनन्द उठाता है।हमारा जीवन भी शुभअशुभ का मिश्रण है। यह तो उसका स्वभाव ही है। अत सदैव अशुभ के प्रति असंतोष व्यक्त करते हुये उससे पलायन और शुभ की स्पृहा लगी रहना अविवेक के कारण ही सम्भव है। ज्ञानी पुरुष अपने नित्य स्वरूप में स्थित होने के कारण जीवन की उत्कृष्ट एवं निकृष्ट परिस्थितियों में पूर्ण वैराग्य के साथ रहता है।अर्जुन का प्रश्न था कि स्थित प्रज्ञ किस प्रकार बोलता है  यह श्लोक उसके उत्तर स्वरूप है। शुभअशुभ हर्ष और विषाद के द्वन्द्वों से सर्वथा मुक्त ज्ञानी पुरुष के लिये सब सुन्दर ही है। अपनी कल्पनाओं का आरोप किये बिना वस्तुएँ जैसी हैं वह उनका वैसा ही अवलोकन करता है। ऐसा स्थितप्रज्ञ पुरुष पाश्चात्य मनोविज्ञान द्वारा ज्ञात व्यवहार के सभी नियमों से परे है।

English Translation By Swami Sivananda

He who is everywhere without attachment, on meeting with anything good or bad, who neither rejoices not hastes, his wisdom is fixed.

Transliteration

yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham
nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā

अनुवाद

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित है, उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त करके न तो प्रसन्न होता है और न ही द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) व्यक्ति के लक्षण बताते हैं। ऐसा व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं और परिस्थितियों के प्रति किसी भी प्रकार का मोह या आसक्ति नहीं रखता। चाहे उसके जीवन में अनुकूल (शुभ) परिस्थितियाँ आएं या प्रतिकूल (अशुभ), वह न तो अत्यधिक हर्षित होता है और न ही शोक या द्वेष करता है। इसी समभाव के कारण उसकी बुद्धि परमात्मा में स्थिर रहती है।

Translation

He who is unattached everywhere, who neither rejoices nor hates upon obtaining good or evil, his wisdom is firmly established.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of a person with steady wisdom (Sthitaprajna). Such a person is completely free from worldly attachments and affections. Whether they encounter favorable (good) or unfavorable (bad) situations, they neither rejoice in success nor despair in failure. Because of this equanimity, their consciousness remains firmly established in the Supreme.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यःजो
सर्वत्रसब जगह
अनभिस्नेहःस्नेहरहित है
तत्उस
तत्उस
प्राप्यप्राप्त करके
शुभम्शुभ को
अशुभम्अशुभ को
नन तो
अभिनन्दतिप्रसन्न होता है
नन ही
द्वेष्टिद्वेष करता है
तस्यउसकी
प्रज्ञाबुद्धि
प्रतिष्ठितास्थिर है

Word by word

WordMeaning
yaḥwho
sarvatraeverywhere
anabhisnehaḥwithout affection
tatthat
tatthat
prāpyahaving obtained
śubhamgood
aśubhamevil
nanot
abhinandatirejoices
nanor
dveṣṭihates
tasyahis
prajñāwisdom
pratiṣṭhitāis established