श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.56

मूल श्लोक :

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

स्थितप्रज्ञ का मुख्य लक्षण है आत्मानन्द की अनुभूति द्वारा सब कामनाओं का त्याग। श्रीकृष्ण ज्ञानी की पहचान का दूसरा लक्षण बताते हैं  सुख और दुख में मन का समत्व रहना। शरीर धारणा के कारण उसको होने वाले अनुभवों के भोक्ता के रूप में उसके व्यवहार को यहां बताया गया है।स्थितप्रज्ञ मुनि वह है जो राग भय और क्रोध से मुक्त है। यदि हम पूर्णत्व प्राप्त पुरुषों की जीवनियों का अध्ययन करें तो उनमें हमें सामान्य मनुष्य से सर्वथा विपरीत लक्षण देखने को मिलेंगे। सामान्य पुरुषों की सैकड़ों प्रकार की भावनायें और गुण ज्ञानी पुरुष में नहीं होते और इसलिये यहां केवल तीन गुणों के अभाव को बताने से हमें आश्चर्य होगा। तब एक शंका मन में उठती है  क्या व्यास जी अन्य गुणों को भूल गये  क्या यह वाक्य पूर्ण लक्षण बताता है  परन्तु विचार करने पर ज्ञात होगा कि ये शंकायें निर्मूल हैं।पूर्व श्लोक में ज्ञानी के निष्कामत्व को बताया गया है और यहाँ उसके मन की स्थिरता को। जगत् में अनेक विषयों के अनुभव से हम जानते हैं कि उनके साथ राग या आसक्ति की वृद्धि होने से मन में भय भी उत्पन्न होने लगता है। विषय को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होने पर यह भय होता है कि वास्तव में वह वस्तु प्राप्त होगी अथवा नहीं। वस्तु के प्राप्त होने पर भी उसकी सुरक्षा के लिये चिन्ता और भय लगे ही रहते हैं।राग और भय से अभिभूत व्यक्ति के और उसकी इष्ट वस्तु के मध्य कोई विघ्न आता है तो उस विघ्न की ओर मन में जो भाव उठता है उसे कहते हैं क्रोध। क्रोध के आवेग की तीव्रता राग और भय की तीव्रता के समान अनुपात में होती है। अर्थ यह हुआ कि राग ही निमित्तवशात् क्रोध के रूप में व्यक्त होता है।श्री शंकराचार्य जी भाष्य में लिखते हैं कि ज्ञानी पुरुष त्रिविध तापों में स्थिरचित्त रहता है। वे त्रिविध दुख हैं  (क) आध्यात्मिकशरीर में रोग आदि  (ख) आधिभौतिकबाह्य वस्तुओं आदि से प्राप्त जैसे व्याघ्र चोर आदि  (ग) आधिदैविकप्रकृति के प्रकोप जैसे भूकम्प तूफान आदि। ईंधन के डालने पर अग्नि प्रज्वलित होती है। परन्तु ज्ञानी पुरुष में अनेक विषय रूप ईंधन डालने पर भी इच्छा की अग्नि उग्ररूप धारण नहीं करती। ऐसे पुरुष को कहते हैं स्थितप्रज्ञ मुनि।और आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

He whose mind is not shaken by adversity, who does not hanker after pleasures, and is free from attachment, fear and anger, is called a sage of steady wisdom.

Transliteration

duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ
vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate

अनुवाद

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जिसकी कोई लालसा नहीं रहती, तथा जो आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त है, ऐसा स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति मुनि कहा जाता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को एक स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) व्यक्ति के लक्षण बताते हैं। ऐसा व्यक्ति जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख और दुःख में समभाव रखता है। वह सांसारिक इच्छाओं, भय और क्रोध से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है, और इसी कारण उसे सच्चा मुनि कहा जाता है।

Translation

One whose mind remains unagitated amidst sorrows, who is free from craving for pleasures, and who is devoid of attachment, fear, and anger, is called a sage of steady wisdom.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of a person with steady wisdom to Arjuna. Such a person maintains equanimity through life’s ups and downs, remaining unaffected by both sorrow and joy. Having completely freed themselves from worldly attachments, fear, and anger, they are recognized as a true sage.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
दुःखेषुदुःखों में
अनुद्विग्नमनाःउद्वेगरहित मन वाला
सुखेषुसुखों में
विगतस्पृहःइच्छा से रहित
वीतरागभयक्रोधःआसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त
स्थितधीःस्थिर बुद्धि वाला
मुनिःमुनि
उच्यतेकहा जाता है

Word by word

WordMeaning
duḥkheṣuin sorrows
anudvignamanāḥwhose mind is unagitated
sukheṣuin happiness
vigataspṛhaḥfree from craving
vītarāgabhayakrodhaḥfree from attachment, fear, and anger
sthitadhīḥof steady wisdom
muniḥa sage
ucyateis called