Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.55
मूल श्लोक :
श्री भगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपनेआपसे अपनेआपमें ही सन्तुष्ट रहता है उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
आत्मानुभवी पुरुष के आन्तरिक और बाह्य जीवन का वर्णन कर भेड़ की खाल में छिपे भालुओं के समान पाखण्डी गुरुओं से भिन्न सच्चे गुरु को पहचानने में गीता हमारी सहायता करती है। इसके अतिरिक्त यह प्रकरण साधकों के लिये विशेष महत्त्व का है क्योंकि इसमें आत्मानुभूति के लिये आवश्यक जीवन मूल्यों एवं विभिन्न परिस्थितियों में मन की स्थिति कैसी होनी चाहिये इसका विस्तार से वर्णन है।इस विषय के प्रारम्भिक श्लोक में ही ज्ञानी पुरुष की आन्तरिक मनस्थिति के वे समस्त लक्षण वर्णित हैं जिन्हे हमको जानना चाहिये। उपनिषद् रूपी उद्यान में खिले शब्द रूपी सुमनों की इस विशिष्ट सुगन्ध से सुपरिचित होने पर ही हमें इस श्लोक में प्रयुक्त शब्दोंें का सम्यक् ज्ञान हो सकता है। जिसने मन में स्थित सभी कामनाओं को त्याग दिया वह पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है। श्रीकृष्ण ने अब तक जो कहा उसके सन्दर्भ में इस श्लोक का अध्ययन करने पर हम वास्तव में व्यास जी के प्रेरणाप्रद शब्दों के द्वारा औपनिषदीय सुरभि का अनुभव कर सकते हैं।आत्मस्वरूप अज्ञान से दूषित बुद्धि कामनाओं के पल्लवित होने के लिये योग्य क्षेत्र बन जाती है। परन्तु जिस पुरुष का अज्ञान आत्मानुभव के सम्यक् ज्ञान से निवृत्त हो जाता है उसका निष्काम हो जाना स्वाभाविक है। यहाँ कार्य के निषेध से कारण का निषेध किया गया है। जहाँ कामनायें नहीं वहाँ अज्ञान नष्ट हो चुका है और ज्ञान तो वहाँ प्रकाशित हो ही रहा है।यदि सामान्य जनों से ज्ञानी को विशिष्टता प्रदान करने वाला यही एक मात्र लक्षण हो तो आज का कोई भी शिक्षित व्यक्ति हिन्दू महात्मा को पागल ही समझेगा क्योंकि आत्मानुभव के बाद उस ज्ञानी में इतनी भी सार्मथ्य नहीं रहेगी कि वह इच्छा कर सके इच्छा क्या है इच्छा मन की वह क्षमता है जो भविष्य में ऐसी वस्तु को पाने की योजना बनाये जिससे कि मनुष्य पहले से अधिक सुखी बन सके। ज्ञानी पुरुष इस सार्मथ्य को भी खो देगा यह है भौतिकवादियों द्वारा की जाने वाली आलोचना।उपर्युक्त प्रकार से इस श्लोक की आलोचना नहीं की जा सकती क्योंकि दूसरी पंक्ति में यह बताया गया है कि ज्ञानी पुरुष अपने आनन्दस्वरूप में सन्तुष्ट रहता है। केवल यह नहीं कहा कि वह सब कामनाओं को त्याग देता है वरन् निश्चित रूप से वह आत्मानन्द का अनुभव करता है।यह सर्वविदित तथ्य है कि बाल्यावस्था में जिन खिलौनों के साथ बालक रमता है उनको युवावस्था में वह छोड़ देता है। आगे वृद्ध होने पर उसकी इच्छायें परिवर्तित हो जाती हैं और युवावस्था में आकर्षक प्रतीत होने वाली वस्तुओं के प्रति उसके मन में कुछ राग नहीं रह जाता।अज्ञान दशा में मनुष्य स्वयं को परिच्छिन्न अहंकार के रूप में जानता है। इसलिये विषयोपभोग की स्पृहा अपनी भावनाओं एवं विचारों के साथ आसक्ति स्वाभाविक होती है। अज्ञान के नष्ट होने पर यह अहंकार अपने शुद्ध अनन्त स्वरूप में विलीन हो जाता है और स्थितप्रज्ञ पुरुष आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है। सब कामनायें समाप्त हो जाती हैं क्योंकि वह स्वयं आनन्दस्वरूप बनकर स्थित हो जाता है।
English Translation By Swami Sivananda
The Blessed Lord said When a man completely casts off, O Arjuna, all the desires of the mind and is satisfied in the Self by the Self, then is he said to be one of steady wisdom.
Transliteration
śrī bhagavānuvāca
prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha manogatān
ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyateअनुवाद
श्री भगवान ने कहा — हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को भली-भांति त्याग देता है और अपने आप से अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) कहा जाता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) व्यक्ति के लक्षण बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपने मन में उत्पन्न होने वाली सभी सांसारिक इच्छाओं और कामनाओं का पूरी तरह से त्याग कर देता है, तो वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। ऐसा व्यक्ति बाहरी भौतिक सुखों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि अपनी ही आत्मा में पूर्ण आनंद और संतुष्टि का अनुभव करता है।
Translation
The Supreme Lord said: O Partha, when a person completely discards all desires of the mind and is satisfied in the self by the self alone, then he is called a person of steady wisdom.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the primary characteristics of a person situated in steady wisdom (sthitaprajna). He explains that such an enlightened person completely eradicates all material desires and cravings concocted by the mind. Instead of seeking happiness in external objects, they find complete satisfaction and bliss within their own self.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्री भगवान् | श्री भगवान |
| उवाच | बोले |
| प्रजहाति | त्याग देता है |
| यदा | जब |
| कामान् | कामनाओं को |
| सर्वान् | सभी |
| पार्थ | हे पार्थ |
| मनोगतान् | मन में स्थित |
| आत्मनि | आत्मा में |
| एव | ही |
| आत्मना | आत्मा के द्वारा (अपने आप से) |
| तुष्टः | संतुष्ट |
| स्थितप्रज्ञः | स्थिर बुद्धि वाला (स्थितप्रज्ञ) |
| तदा | तब |
| उच्यते | कहा जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrī bhagavān | the Supreme Lord |
| uvāca | said |
| prajahāti | discards |
| yadā | when |
| kāmān | desires |
| sarvān | all |
| pārtha | O Partha |
| manogatān | situated in the mind |
| ātmani | in the pure self |
| eva | alone |
| ātmanā | by the self |
| tuṣṭaḥ | satisfied |
| sthitaprajñaḥ | one of steady wisdom |
| tadā | then |
| ucyate | is said |