Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.54
मूल श्लोक :
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
अर्जुन बोले हे केशव परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है कैसे बैठता है और कैसे चलता है
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इसके पूर्व के दो श्लोकों में कर्मयोग पर विचार करते हुये सहज रूप से कर्म योगी के परम लक्ष्य की ओर भगवान् ने संकेत किया है। यह सिद्धान्त बुद्धि ग्राह्य एवं युक्तियुक्त था। भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से सुनने पर उसके प्रामाण्य के विषय में भी कोई संदेह नहीं रह जाता। अर्जुन का स्वभाव ही ऐसा था कि उसे कर्मयोग ही ग्राह्य हो सकता था।प्रथम अध्याय का शोकाकुल अर्जुन अपने शोक को भूलकर संवाद में रुचि लेने लगा। कर्मशील स्वभाव के कारण उसे शंका थी कि बुद्धियोग के द्वारा जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेने पर इस जगत् में कर्ममय जीवन संभव होगा अथवा नहीं।समाधि आदि शब्दों के प्रचलित अर्थ से तो कोई यही समझेगा कि योगी पुरुष आत्मानुभूति में अपने ही एकान्त में रमा रहता है। प्रचलित वर्णनों के अनुसार नये जिज्ञासु साधक की कल्पना होती है कि ज्ञानी पुरुष इस व्यावहारिक जगत् के योग्य नहीं रह जाता। ऐसी धारणाओं वाले घृणा और कूटिनीति के युग में पला अर्जुन इस ज्ञान को स्वीकार करने के पूर्व ज्ञानी पुरुष के लक्षणों को जानना चाहता था।स्थितप्रज्ञ के लक्षणों को पूर्णत समझने की उसकी अत्यन्त उत्सुकता स्पष्ट झलकती है जब वह कुछ अनावश्यक सा यह प्रश्न पूछता है कि वह पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है आदि। उन्माद की अवस्था से बाहर आये अर्जुन का ऐसा प्रश्न उचित ही है। श्लोक की पहली पंक्ति में स्थितप्रज्ञ के आन्तरिक स्वभाव के विषय में प्रश्न है तो दूसरी पंक्ति में वाह्य जगत् में उसके व्यवहार को जानने की जिज्ञासा है।इस प्रकरण में स्थितप्रज्ञ का अर्थ है वह पुरुष जिसे आत्मा का अपरोक्ष अनुभव हुआ हो।अब भगवान् ज्ञानी पुरुष के उन लक्षणों का वर्णन करते हैं जो उसके लिये स्वाभाविक हैं और एक साधक के लिये साधन रूप हैं
English Translation By Swami Sivananda
Arjuna said What, O Krishna, is the description of him who has steady wisdom, and is merged in the superconscious state? How does one of steady wisdom speak, how does he sit, how does he walk?
Transliteration
arjuna uvāca
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava
sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kimअनुवाद
अर्जुन ने कहा — हे केशव! समाधि में स्थित स्थिर प्रज्ञा वाले पुरुष का क्या लक्षण है? स्थिर बुद्धि वाला पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन श्रीकृष्ण से एक आत्मज्ञानी (स्थितप्रज्ञ) पुरुष के लक्षणों के बारे में चार विशिष्ट प्रश्न पूछते हैं। वह जानना चाहते हैं कि समाधि में स्थित व्यक्ति को उसके दैनिक व्यवहार, बोलचाल और उठने-बैठने के तरीके से कैसे पहचाना जा सकता है। यह प्रश्न अध्याय के शेष भाग में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए आत्मज्ञानी के विस्तृत वर्णन की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
Translation
Arjuna said: O Keshava, what is the description of a man of steady wisdom who is merged in samadhi? How does the man of steady intelligence speak? How does he sit? How does he walk?
Meaning
In this verse, Arjuna asks Krishna four specific questions about the characteristics of an enlightened person (Sthitaprajna). He wants to know how such a person can be recognized in daily life through their speech, actions, and demeanor. This sets the stage for Krishna’s detailed description of a realized soul in the remainder of the chapter.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन ने |
| उवाच | कहा |
| स्थितप्रज्ञस्य | स्थिर प्रज्ञा वाले पुरुष का |
| का | क्या |
| भाषा | लक्षण है |
| समाधिस्थस्य | समाधि में स्थित |
| केशव | हे केशव |
| स्थितधीः | स्थिर बुद्धि वाला पुरुष |
| किम् | कैसे |
| प्रभाषेत | बोलता है |
| किम् | कैसे |
| आसीत | बैठता है |
| व्रजेत | चलता है |
| किम् | कैसे |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| arjunaḥ | Arjuna |
| uvāca | said |
| sthitaprajñasya | of one whose wisdom is steady |
| kā | what |
| bhāṣā | is the description |
| samādhisthasya | of one situated in samadhi |
| keśava | O Keshava |
| sthitadhīḥ | the man of steady intelligence |
| kim | how |
| prabhāṣeta | does he speak |
| kim | how |
| āsīta | does he sit |
| vrajeta | does he walk |
| kim | how |