Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.53
मूल श्लोक :
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जब पाँचो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण करने पर भी जिसकी बुद्धि अविचलित रहती है तब उसे योग में स्थित समझा जाता है। सामान्यत इन्द्रियों के विषय ग्रहण के कारण मन में अनेक विक्षेप उठते हैं। योगस्थ पुरुष का मन इन सबमें निश्चल रहता है। उसके विषय में आगे स्थितप्रज्ञ के लक्षण और अधिक विस्तार से बताते हैं।अनेक व्याख्याकार इसका अर्थ इस प्रकार करते हैं कि विभिन्न दार्शनिकों के परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले सिद्धान्तों को सुनकर जिसकी बुद्धि विचलित नहीं होती वह योग में स्थित हुआ समझा जाता है।अब तक के प्रस्तुत किये गये तर्कों से इस विषय में अर्जुन की रुचि बढ़ने लगती है और उन्माद का प्रभाव कम होने लगता है। अपने विषाद और दुख को भूलकर श्रीकृष्ण के प्रवचन में स्वयं रुचि लेते हुये ज्ञानी पुरुष के लक्षणों को जानने की अपनी उत्सुकता को वह नहीं रोक सका। उसके प्रश्न से स्पष्ट दिखाई देता है कि वह भगवान् के सिद्धान्त को ग्रहण कर रहा है फिर भी उसके मन में कुछ है जिसके कारण वह इसे पूर्णत स्वीकार नहीं कर पा रहा था।प्रश्न पूछने के लिए अवसर पाकर समत्व में स्थित बुद्धि वाले पुरुष के लक्षणों को जानने की उत्सुकता से अर्जुन प्रश्न करता है
English Translation By Swami Sivananda
When thy intellect, which is perplexed by the Veda text, which thou hast read, shall stand immovable and steady in the Self, then thou shalt attain Self-realisation.
Transliteration
śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā
samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasiअनुवाद
जब तुम्हारी बुद्धि, जो वेदों के अनेक अर्थों को सुनने से विचलित हो गई है, समाधि में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त करोगे।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण आध्यात्मिक बुद्धि की परिणति को समझाते हैं। अर्जुन का मन वर्तमान में शास्त्रों में वर्णित विभिन्न सकाम कर्मों और मतभेदों को सुनकर भ्रमित है। कृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं कि जब उसकी बुद्धि इन सबसे विरक्त होकर परमात्मा के ध्यान (समाधि) में पूरी तरह से स्थिर और अचल हो जाएगी, तब उसे वास्तविक योग या आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होगी।
Translation
When your intelligence, bewildered by hearing various interpretations of the Vedas, shall stand unmoved and unwavering in divine consciousness, then you shall attain yoga.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the culmination of spiritual intelligence. Arjuna’s mind is currently confused by the various conflicting instructions and rituals mentioned in the scriptures. Krishna assures him that once his mind becomes completely focused and unwavering in divine consciousness (samadhi), he will achieve true yoga or union with the Supreme.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रुतिविप्रतिपन्ना | वेदों को सुनने से विचलित |
| ते | तुम्हारी |
| यदा | जब |
| स्थास्यति | स्थित होगी |
| निश्चला | अचल |
| समाधौ | समाधि में |
| अचला | स्थिर |
| बुद्धिः | बुद्धि |
| तदा | तब |
| योगम् | योग को |
| अवाप्स्यसि | प्राप्त करोगे |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrutivipratipannā | bewildered by hearing |
| te | your |
| yadā | when |
| sthāsyati | shall remain |
| niścalā | unmoved |
| samādhau | in divine consciousness |
| acalā | unwavering |
| buddhiḥ | intelligence |
| tadā | then |
| yogam | yoga (self-realization) |
| avāpsyasi | you will attain |