Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.52
मूल श्लोक :
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य चHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
मोह निवृत्ति होने पर वैराग्य प्राप्ति का आश्वासन यहाँ अर्जुन को दिया गया है। श्रोतव्य शब्द से तात्पर्य उन सभी विषयोपभोगों से है जिनका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया गया है तथा श्रुत शब्द से सभी ज्ञान अनुभव सूचित किये गये हैं। यह स्वाभाविक है कि बुद्धि के शुद्ध होने पर विषयोपभोग में कोई राग नहीं रह जाता।स्वरूप से दिव्य होते हुये भी चैतन्य आत्मा मोहावरण में फँसी हुई प्रतीत होती है। इस मोह का कारण है एक अनिर्वचनीय शक्ति माया। अव्यक्त विद्युत के समान माया भी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होती परन्तु विभिन्न रूपों में उसकी अभिव्यक्ति से उसका अस्तित्व सिद्ध होता है।सभी जीवों की संरचना में माया के कार्य के निरीक्षण एवं अध्ययन से वेदान्त के आचार्यों ने यह पाया कि मनुष्य के व्यक्तित्व के दो स्तरों पर माया की अभिव्यक्ति दो प्रकार से होती है। बुद्धि पर आत्मस्वरूप के अज्ञान के रूप में पड़े इस आवरण को वेदान्त में माया की आवरण शक्ति कहा गया है। बुद्धि पर पड़े इस अज्ञान आवरण के कारण मन अनात्म जगत् की कल्पना करता है और उस जगत् के विषय में उसकी दो धारणायें दृढ़ होती हैं कि (क) यह सत्य है और (ख) यह अनात्मा (देह आदि) ही में हूँ। मन के स्तर पर कार्य करने वाली माया की यह शक्ति विक्षेप शक्ति कहलाती है।इस श्लोक में कहा गया है कि कर्मयोग की भावना से कर्म करते रहने पर बुद्धि की शुद्धि होती है और तब उसके लिये सम्भव होता है कि आवरण को हटाकर आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सके। इस प्रकार मोह निवृति का परिणाम है विषयोपभोग से वैराग्य परन्तु आत्मअज्ञान के होने पर मनुष्य विषयों से ही सुख पाने की आशा में दिनरात परिश्रम करता रहता है।शीत ऋतु में बादलों से सूर्य के आच्छादित होने पर मनुष्य अग्नि जलाकर उसके समीप बैठता है किन्तु धीरेधीरे बादलों के हट जाने पर सूर्य की उष्णता का अनुभव कर वह अग्नि के पास से उठकर धूप का आनन्द लेता है। वैसे ही आनन्दस्वरूप के अज्ञान के कारण विषयों को पाने के लिये चल रही मनुष्य की भागदौड़ स्वत समाप्त हो जाती है जब वह स्वस्वरूप को पहचान लेता है।यहाँ सम्पूर्ण जगत् का निर्देश श्रुत और श्रोतव्य इन दो शब्दों से किया गया है। इसमें सभी इन्द्रियों द्वारा ज्ञात होने वाले विषय समाविष्ट हैं। कर्मयोगी की बुद्धि न तो पूर्वानुभूत विषय सुखों का स्मरण करती है और न ही भविष्य में प्राप्त होनेवाले अनुभवों की आशा।भाष्यकार भगवान् शंकराचार्य अगले श्लोक की संगति बताते हैं कि यदि तुम्हारा प्रश्न हो कि मोहावरण भेदकर और विवेकजनित आत्मज्ञान को प्राप्त कर कर्मयोग के फल परमार्थयोग को तुम कब पाओगे तो सुनो
English Translation By Swami Sivananda
When thy intellect crosses beyond the mire of delusion, then thou shalt attain to indifference as to what has been heard and what has yet to be heard.
Transliteration
yadā te mohakalilaṃ buddhirvyatitariṣyati
tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya caअनुवाद
जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को भली-भाँति पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य (सभी विषयों के) प्रति वैराग्य को प्राप्त होओगे।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण आध्यात्मिक बुद्धि और वैराग्य के उदय का वर्णन करते हैं। जब मनुष्य की बुद्धि सांसारिक मोह और अज्ञान के दलदल को पार कर लेती है, तब उसमें स्वाभाविक रूप से वैराग्य उत्पन्न हो जाता है। उस अवस्था में पहुँचने पर, व्यक्ति इस लोक या परलोक के सुने हुए और सुनने योग्य सभी भोगों के प्रति पूरी तरह से उदासीन हो जाता है।
Translation
When your intelligence crosses beyond the mire of delusion, then you shall attain indifference to all that has been heard and all that is to be heard.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the result of spiritual intelligence and detachment. When a person’s mind completely overcomes the confusion caused by material attachments, they naturally develop dispassion. At that stage, they are no longer influenced by Vedic rituals promising heavenly rewards or any worldly knowledge they have heard or are yet to hear.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यदा | जब |
| ते | तुम्हारी |
| मोहकलिलम् | मोह रूपी दलदल को |
| बुद्धिः | बुद्धि |
| व्यतितरिष्यति | पार कर जाएगी |
| तदा | तब |
| गन्तासि | तुम प्राप्त होओगे |
| निर्वेदम् | वैराग्य को |
| श्रोतव्यस्य | सुनने योग्य के |
| श्रुतस्य | सुने हुए के |
| च | और |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yadā | when |
| te | your |
| mohakalilam | the mire of delusion |
| buddhiḥ | intelligence |
| vyatitariṣyati | will cross over |
| tadā | then |
| gantāsi | you shall attain |
| nirvedam | indifference |
| śrotavyasya | of what is to be heard |
| śrutasya | of what has been heard |
| ca | and |