श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.50

मूल श्लोक :

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

बुद्धि(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग(समता) में लग जा क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भावनाओं की दुर्बलताओं से ऊपर उठकर जो पुरुष समत्व बुद्धियुक्त हो जाता है वह पाप और पुण्य दोनों के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। पाप और पुण्य मन की धारणायें हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ मन पर वासनाओं के रूप में अंकित होती हैं। मनरूपी विक्षुब्ध समुद्र के साथ जो व्यक्ति तादात्म्य नहीं करता वह वासनाओं की ऊँचीऊँची तरंगों के द्वारा न तो ऊपर फेंका जायेगा और न नीचे ही डुबोया जायेगा। यहाँ वर्णित मन का बुद्धि के साथ युक्त होना ही बुद्धियुक्त शब्द का अर्थ है।इस सम्पूर्ण प्रकरण में गीता का मानव मात्र को आह्वान है कि वह केवल इन्द्रियों के विषय स्थूल देह और मन के स्तर पर ही न रहे जो उसके व्यक्तित्व का बाह्यतम पक्ष है। इनसे सूक्ष्मतर बुद्धि का उपयोग कर उसको अपने वास्तविक पुरुषत्व को व्यक्त करना चाहिये। प्राणियों की सृष्टि में केवल बौद्धिक क्षमताओं के कारण ही मनुष्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जब तक मनुष्य प्रकृति के इस विशिष्ट उपहार का सम्यक् प्रकार से उपयोग नहीं करता तब तक वह अपने मनुष्यत्व के अधिकार से वंचित ही रह जाता है।अर्जुन से मानसिक उन्माद त्यागकर वीर पुरुष के समान परिस्थितियों का स्वामी बनकर रहने के लिये भगवान् कहते हैं। उस समय अर्जुन इतना भावुक और दुर्बल हो गया था कि वह अपनी व अन्यों के शारीरिक सुरक्षा की चिन्ता करने लगा था। विकास की सीढ़ी पर मनुष्यत्व को प्राप्त कर जो अपनी विशेष क्षमताओं का पूर्ण उपयोग करता है वही व्यक्ति जन्म जन्मान्तरों में अर्जित वासनाओं के बन्धन से मुक्त हो जाता है। इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ यह भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश है। इसके पूर्व समत्व को योग कहा गया था। अब इस सन्दर्भ में व्यासजी योग की और विशद परिभाषा देते हैं कि कर्म में कुशलता योग है।किसी भी विषय के शास्त्रीय ग्रन्थ में यदि भिन्नभिन्न अध्यायों में एक ही शब्द की विभिन्न परिभाषायें दी गई हों तो समझने में कठिनाई और भ्रांति होगी। फिर धर्म के इस शास्त्रीय ग्रन्थ में एक ही शब्द की विभिन्न परिभाषायें कैसे बताई हुई हैं  उपर्युक्त परिभाषा को ठीक से समझने पर इस समस्या का स्वयं समाधान हो जायेगा। योग की पूर्वोक्त परिभाषा यहाँ भी संग्रहीत है अन्यथा मन के समभाव का अर्थ अकर्मण्यता एवं शिथिलता उत्पन्न करने वाली मन की समता को ही कोई समझ सकता है। इस श्लोक में ऐसी त्रुटिपूर्ण धारणा को दूर करते हुये कहा गया है कि समस्त प्रकार के द्वन्द्वों में मन के सन्तुलन को न खोकर कुशलतापूर्वक कर्म करना ही कम्र्ायोग है।इस श्लोक के स्पष्टीकरण से श्रीकृष्ण का उद्देश्य ज्ञात होता है कि कर्मयोग की भावना से कर्म करने पर वासनाओं का क्षय होता है। वासनाओं के दबाव से ही मन में विक्षेप उठते हैं। किन्तु वासना क्षय के कारण मन स्थिर और शुद्ध होकर मनन निदिध्यासन और आत्मानुभूति के योग्य बन जाता है।योग शब्द का इस अथ मेंर् प्रयोग कर व्यास जी हमारे मन में उसके प्रति व्याप्त भ्राँति को दूर कर देते हैं।समत्व भाव एवं कर्म में कुशलता की क्या आवश्यकता है  उत्तर में कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Endowed with wisdom (evenness of mind), one casts off in this life both good and evil deeds; therefore, devote thyself to Yoga; Yoga is skill in action.

Transliteration

buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte
tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam

अनुवाद

समबुद्धि से युक्त मनुष्य इस जीवित अवस्था में ही पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए तुम योग (समत्व) में लग जाओ; क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है।

भावार्थ

जो मनुष्य समबुद्धि (समत्व) में स्थित होता है, वह इसी जन्म में पाप और पुण्य दोनों के बंधनों से मुक्त हो जाता है। फल की आसक्ति के बिना कर्म करने से मनुष्य नए कर्मफलों में नहीं बंधता। इसलिए भगवान कृष्ण अर्जुन को समत्व योग अपनाने की प्रेरणा देते हैं, क्योंकि कर्मों को बंधन रहित होकर करना ही सच्ची कुशलता है।

Translation

Endowed with the wisdom of equanimity, one casts off in this life both good and evil deeds. Therefore, devote yourself to yoga; yoga is skill in action.

Meaning

A person whose mind is established in equanimity transcends the dualities of good and bad karma in this very life. By acting without attachment to the results, one avoids accumulating new karmic reactions. Therefore, Lord Krishna urges Arjuna to practice this yoga of equanimity, as true skill in action lies in working without being bound by it.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
बुद्धि-युक्तःसमबुद्धि से युक्त
जहातित्याग देता है
इहइसी जन्म में
उभेदोनों को
सुकृत-दुष्कृतेपुण्य और पाप
तस्मात्इसलिए
योगाययोग के लिए
युज्यस्वलग जाओ
योगःयोग ही
कर्मसुकर्मों में
कौशलम्कुशलता है

Word by word

WordMeaning
buddhi-yuktaḥendowed with wisdom (equanimity)
jahāticasts off
ihain this life
ubheboth
sukṛta-duṣkṛtegood and evil deeds
tasmāttherefore
yogāyafor yoga
yujyasvaengage yourself
yogaḥyoga
karmasuin actions
kauśalamskill