Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.5
मूल श्लोक :
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ। गुरुजनोंको मारकर यहाँ रक्तसे सने हुए तथा धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगोंको ही तो भोगूँगा
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अत्यन्त उच्च प्रतीत होने वाले परन्तु वास्तव में अर्थशून्य तर्क अर्जुन पुन प्रस्तुत करता है क्योंकि स्वयं को न समझने के कारण वह अपनी समस्या को भी नहीं समझ पाया है।यहाँ उसने अपने गुरुओं अर्थात् भीष्म और द्रोण को महानुभाव कहा है जिसका अर्थ है अपने युग के आदर्श पुरुष। अपनी संस्कृति में जो कुछ उच्च और श्रेष्ठ है उसके वे प्रतीक स्वरूप हैं जिन्होंने विशाल और उदार अन्तकरण से सनातन धर्म के लिये अनेक प्रकार के त्याग किये। अपनी संस्कृति के ऐसे श्रेष्ठ आदर्श युगपुरुषों का नाश केवल व्यक्तिगत शक्ति एवं पदलिप्सा के लिये करना किसी प्रकार उचित नहीं प्रतीत होता है। केवल वह युग विशेष ही नहीं बल्कि इन महापुरुषों के अमूल्य जीवनोच्छेद होने से भावी पीढ़ियाँ भी दरिद्र हो जायेंगी।अर्जुन कहता है कि संस्कृति के उपवन के सुन्दरतम् सुमनों को विनष्ट करने का विचार त्याग कर पाण्डवों के लिये भिक्षान्न पर जीवन यापन करना अधिक उचित होगा। इन गुरुजनों को मारकर प्राप्त किये गये राज्य का उपभोग भी वह नहीं कर सकेगा क्योंकि वे सब उनकी कटु स्मृतियों और मूल्यवान रक्त से सने होंगे जिनको विस्मृत कर पाना कठिन होगा।एक बार यदि हम परिस्थिति का त्रुटिपूर्ण आकलन कर लेते हैं तो भावनाओं के कारण हमारी बुद्धि पर आवरण पड़ जाता है और तब हम भी जीवन में अर्जुन के समान व्यवहार करने लगते हैं। इसका स्पष्ट संकेत व्यास जी द्वारा इस घटना में किये गये विस्तृत वर्णन में देखने को मिलता है।
English Translation By Swami Sivananda
Better it is, indeed, in this world to accept alms than to slay the most noble teachers. But if I kill them, even in this world all my enjoyments of wealth and fulfilled desires will be stained with (their) blood.
Transliteration
gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke
hatvārthakāmāṃstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhānअनुवाद
इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी अधिक श्रेष्ठ है। परन्तु गुरुजनों को मारकर तो मैं इस लोक में खून से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही भोगूंगा।
भावार्थ
अर्जुन अपने गहरे नैतिक संकट और युद्ध के प्रति अपनी अरुचि को व्यक्त करते हैं। उनका मानना है कि भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय गुरुओं की हत्या करने से बेहतर है कि भिक्षा मांगकर जीवन यापन किया जाए। वे तर्क देते हैं कि उनके रक्तपात से प्राप्त कोई भी सांसारिक विजय या धन कलंकित होगा और उससे उन्हें कोई वास्तविक सुख नहीं मिलेगा।
Translation
It is better to eat even alms in this world without killing these great-souled gurus. But by killing the gurus, who are desirous of wealth, I would enjoy only blood-stained enjoyments right here in this world.
Meaning
Arjuna expresses his deep moral dilemma and aversion to the war. He feels that living as a beggar is far superior to slaughtering his revered teachers like Bhishma and Drona. He argues that any worldly victory or wealth gained through their bloodshed would be tainted and bring him no real joy.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| गुरून् | गुरुजनों को |
| अहत्वा | न मारकर |
| हि | निश्चय ही |
| महानुभावान् | महानुभावों को |
| श्रेयः | अधिक श्रेष्ठ है |
| भोक्तुम् | खाना |
| भैक्ष्यम् | भिक्षा का अन्न |
| अपि | भी |
| इह | इस |
| लोके | लोक में |
| हत्वा | मारकर |
| अर्थकामान् | अर्थ और काम के इच्छुक |
| तु | परन्तु |
| गुरून् | गुरुजनों को |
| इह | यहाँ |
| एव | ही |
| भुञ्जीय | मैं भोगूंगा |
| भोगान् | भोगों को |
| रुधिरप्रदिग्धान् | खून से सने हुए |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| gurūn | the gurus |
| ahatvā | not killing |
| hi | certainly |
| mahānubhāvān | great-souled ones |
| śreyaḥ | better |
| bhoktum | to eat |
| bhaikṣyam | alms |
| api | even |
| iha | in this |
| loke | world |
| hatvā | having killed |
| arthakāmān | desirous of wealth |
| tu | but |
| gurūn | the gurus |
| iha | here |
| eva | indeed |
| bhuñjīya | I would enjoy |
| bhogān | enjoyments |
| rudhirapradigdhān | tainted with blood |